नीरज प्रजापति
मौत सामने थी, बचाने वाला भी सामने था, फिर भी तमाशबीन बना रहा इंसान, सीसीटीवी में कैद दर्दनाक मंजर ने खड़े किए इंसानियत पर सवाल
मुजफ्फरनगर। शहर के मोहल्ला मल्हूपुरा में 6 सितंबर की सुबह एक ऐसा दर्दनाक हादसा सामने आया, जिसने इंसानी संवेदनाओं की हकीकत की पोल खोल कर रख दी। बारिश के बाद गली में भरे पानी के बीच जिंदगी की तलाश में घूम रहा एक बेजुबान कुत्ता विद्युत विभाग की कथित लापरवाही का शिकार हो गया। ‘लालू’ नाम का यह कुत्ता जैसे ही विद्युत पोल के पास पहुंचा, करंट की चपेट में आ गया और देखते ही देखते उसकी दर्दनाक मौत हो गई। पूरी घटना पास लगे सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। ऐसा नहीं है कि लालू अकेला था लालू के साथ वहां से एक इंसान भी गुर्जर रहा था। लालू के साथ घटित हुई घटना का पूरा मंजर वह इंसान देखता रहा मगर सहायता के लिए एक पल भी आगे नहीं बड़ा और फिर वहां से चला गया अगर वह इंसान चाहत तो शायद लालू आज जिंदा होता और अपने यार दोस्तों के साथ गली मोहल्ले में ही खेलता हुआ दिखाई देता, शायद उसे समय इंसान के दिमाग में यह चल रहा होगा कि यह तो एक जानवर है कोई बात नहीं मगर एक पल के लिए उस इंसान के दिमाग में यह नहीं आया कि इसका भी परिवार होगा इसके भी यार दोस्त होंगे मुझे इसकी जान बचाने का प्रयास करना चाहिए और वह एक स्वार्थी की तरह खड़ा होकर तमाशा देखकर अपने गंतव्य की ओर चला गया। बताया गया कि सुबह करीब 9:45 बजे बारिश के कारण मल्हूपुरा की गली में जलभराव था। इसी दौरान लालू वहां से गुजर रहा था। पानी में विद्युत पोल से उतरे करंट ने उसे अपनी चपेट में ले लिया। कुछ ही क्षणों में एक जिंदा, मासूम और बेजुबान जिंदगी हमेशा के लिए खामोश हो गई। लेकिन इस हादसे की सबसे ज्यादा पीड़ा देने वाली तस्वीर लालू की मौत नहीं, बल्कि उसकी मौत के बाद पसरा सन्नाटा है। अगर इसी जगह किसी इंसान को करंट लग जाता, तो शायद गलियां लोगों के आक्रोश से भर जातीं। विद्युत विभाग के खिलाफ धरना होता, प्रदर्शन होते, मुआवजे की मांग उठती और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई के लिए आवाज बुलंद होती। शायद मोमबत्तियां जलाकर उस इंसान को श्रद्धांजलि भी दी जाती। लेकिन लालू तो इंसान नहीं था… वह सिर्फ एक बेजुबान था। उसके पास अपनी मौत का कारण पूछने के लिए कोई आवाज नहीं थी। अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ थाने या विद्युत विभाग के दरवाजे तक जाने की ताकत नहीं थी। वह केवल इंसानों के बीच रहकर इंसानों पर भरोसा करता था। उसे क्या पता था कि जिस गली से वह रोज गुजरता है, वहीं मौत उसका इंतजार कर रही है। कहा जाता है कि बेजुबान जानवर भी अपने परिवार और अपने साथी रखते हैं। वे भी भूख, दर्द, डर और अपनापन महसूस करते हैं। लालू भी किसी के लिए महज सड़क का कुत्ता नहीं, बल्कि एक पहचान था। मगर उसकी मौत के बाद कथित तौर पर उसके शव को सड़क किनारे पड़े कूड़े के ढेर में फेंक दिया गया। जिसे कभी किसी ने पुचकारा होगा, जिसके सिर पर किसी ने हाथ फेरा होगा, वही जिंदगी मौत के बाद कूड़े के ढेर तक सिमट गई। यह घटना सिर्फ विद्युत विभाग की कथित लापरवाही का सवाल नहीं है, बल्कि हमारी संवेदनाओं का आईना भी है।आज सवाल यह है कि अगर एक बेजुबान की जान की कीमत कुछ भी नहीं है, तो क्या हमारी इंसानियत भी केवल इंसानों तक सीमित रह गई है। लालू बोल नहीं सका, लेकिन उसकी मौत बहुत कुछ कह गई, करंट विद्युत पोल में था, मगर सवाल हमारी संवेदनाओं पर खड़ा हो गया।
