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वाराणसी, 10 जुलाई । उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के बॉटनी (वनस्पति) विभाग के शोधकर्ताओं ने पौधों में बीमारी फैलाने वाले खास फंगस (फाइटोपैथोजेनिक फंगस) के एक नए जीनस, ‘हायलोकमलोमाइसीज़’ की खोज की है। यह खाेज बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि है जाे फंगस के वर्गीकरण (टैक्सोनॉमी) में एक महत्वपूर्ण योगदान है और भारत की समृद्ध में भी, लेकिन अभी भी काफी हद तक अनखोजी फंगल जैव-विविधता को उजागर करना है।

शोध का नेतृत्व विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. राघवेंद्र सिंह ने किया। उनकी टीम में सौम्यदीप राजवार, संजय यादव, संजीत कुमार वर्मा और अर्चना सिंह शामिल है। इस संयुक्त अध्ययन में नेशनल फंगल कल्चर कलेक्शन ऑफ इंडिया , आगरकर रिसर्च इंस्टीट्यूट, पुणे के वैज्ञानिक डॉ. पारस नाथ सिंह, चीन के प्रोफेसर सामंथा, पं.दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय की डॉ. गार्गी सिंह, केरल फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट के सीनियर साइंटिस्ट डॉ. शंभू कुमार भी शामिल रहे। डॉ राघवेन्द्र सिंह के अनुसार नई पहचानी गई फंगस की खोज उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले में स्थित चंद्रप्रभा वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी में ‘कैसिया फिस्टुला’ (जिसे आमतौर पर अमलतास या गोल्डन शावर ट्री कहा जाता है) को प्रभावित करने वाली पत्तियों पर धब्बे (लीफ स्पॉट) की एक उभरती हुई बीमारी के साथ की गई थी।

उन्होंने बताया कि इस प्रजाति की पहचान मॉर्फोलॉजिकल (संरचनात्मक) और कल्चरल अध्ययन, इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी और मल्टीजीन मॉलिक्यूलर फाइलोजेनेटिक विश्लेषण जैसे व्यापक तरीकों से की गई। फाइलोजेनेटिक नतीजों से पता चला कि यह फंगस एक अलग विकासवादी वंश (इवोल्यूशनरी लीनिएज) बनाता है, जो पहले से ज्ञात वंशजों से बिल्कुल अलग है, इसलिए इसे एक नए जीनस के रूप में मान्यता देना सही है।

‘हायलोकमलोमाइसीज़’ नाम में ग्रीक उपसर्ग ‘हयालो’ का इस्तेमाल किया गया है, जिसका अर्थ है “कांच” या “पारदर्शी” (यह फंगस की पारदर्शी संरचनाओं को दर्शाता है)। इसके साथ “-कमलोमाइसीज़ जोड़ा गया है, जो गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर कमल के सम्मान में चुना गया है। वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचाने जाने वाले माइकोलॉजिस्ट (कवक विशेषज्ञ) हैं, जिन्होंने भारत की फंगल जैव-विविधता, खासकर ‘सर्कोस्पोरोइड’ फंगस पर अग्रणी काम किया है और शोधकर्ताओं की कई पीढ़ियों को प्रेरित किया है।

यह खोज आज शुक्रवार (10 जुलाई, 2026) को प्रतिष्ठित Q1 अंतरराष्ट्रीय जर्नल “माइकोलॉजिकल प्रोग्रेस” में प्रकाशित हुई है। यह जर्नल जर्मनी में ‘जर्मन माइकोलॉजिकल सोसाइटी’ के तहत प्रकाशित होता है। लंबे समय तक संरक्षण और भविष्य के शोध को सुनिश्चित करने के लिए, इस फंगस के जीवित कल्चर को नेशनल फंगल कल्चर कलेक्शन ऑफ इंडिया पुणे में संरक्षित किया गया है। डॉ. राघवेंद्र सिंह ने बताया कि कैसिया फिस्टुला, जिसे आम तौर पर अमलतास के नाम से जाना जाता है, आयुर्वेद में एक महत्वपूर्ण औषधीय पौधा है, जिसे परंपरागत रूप से “अरगवधा” कहा जाता है, जिसका अर्थ है “रोगनाशक”। पौधे के विभिन्न भागों – जिनमें जड़ें, छाल, पत्तियां, फूल और फल का गूदा शामिल हैं – का उपयोग लंबे समय से रेचक, सूजनरोधी, एंटीऑक्सीडेंट, रोगाणुरोधी, यकृत-सुरक्षात्मक और श्वसन स्वास्थ्य लाभों के लिए किया जाता रहा है।

इस खोज के व्यापक महत्व पर प्रकाश डालते हुए, डॉ. सिंह ने जोर दिया कि भारत अपने विविध पारिस्थितिक तंत्रों के कारण विश्व के प्रमुख जैव विविधता केंद्रों में से एक और कवक विविधता का वैश्विक केंद्र है। ये आवास हजारों कवक प्रजातियों का समर्थन करते हैं जो पोषक तत्व चक्रण, पारिस्थितिक तंत्र स्थिरता, कृषि, जैव प्रौद्योगिकी और नए जैवसक्रिय यौगिकों की खोज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

वैज्ञानिकों का मानना है कि कई अज्ञात कवकों में नई दवाओं, टिकाऊ कृषि प्रौद्योगिकियों और अन्य जैव प्रौद्योगिकी अनुप्रयोगों के विकास की अपार क्षमता हो सकती है, जिससे कवक जैव विविधता भविष्य के वैज्ञानिक नवाचार के लिए एक मूल्यवान संसाधन बन जाती है।

By editor

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