24 जुलाई को हर की पौड़ी से उठाई कांवड़, हर दिन 6 से 7 किलोमीटर तय कर निभा रहे मातृसेवा और शिवभक्ति का अद्भुत संगम; फलौदा में श्रद्धालुओं ने किया भव्य स्वागत
नीरज प्रजापति
पुरकाजी। श्रावण मास में जहां लाखों शिवभक्त भगवान भोलेनाथ के जयकारों के साथ हरिद्वार से पवित्र गंगाजल लेकर अपने-अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे हैं, वहीं गांव दूल्हेरा निवासी यशवीर भोला अपनी अनूठी कांवड़ यात्रा के कारण श्रद्धालुओं के बीच आस्था, मातृभक्ति और सेवा का जीवंत उदाहरण बन गए हैं। यशवीर अपनी मां कृष्णा और चाची फुल्लो को पालकी में बैठाकर हरिद्वार से पवित्र गंगाजल लेकर पैदल यात्रा कर रहे हैं। उनकी यह सेवा देखकर हर कोई उन्हें आधुनिक श्रवण कुमार की संज्ञा दे रहा है।
यशवीर ने बताया कि उन्होंने 24 जुलाई को हरिद्वार की पावन हर की पौड़ी से गंगाजल उठाया था। तभी से वह प्रतिदिन अपनी मां और चाची को पालकी में बैठाकर लगभग 6 से 7 किलोमीटर की कठिन पदयात्रा करते हुए आगे बढ़ रहे हैं। तपती धूप, थकान और लंबा सफर भी उनकी श्रद्धा और संकल्प को डिगा नहीं पाया। उनके लिए माता-पिता की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म और भगवान शिव की सच्ची आराधना है।
बुधवार को जब यशवीर भोला की पालकी यात्रा पुरकाजी थाना क्षेत्र के गांव फलौदा पहुंची तो ग्रामीणों और शिवभक्तों ने पुष्पवर्षा, जयकारों और माल्यार्पण के साथ उनका भव्य स्वागत किया। पूरा वातावरण “हर-हर महादेव” और “बोल बम” के गगनभेदी उद्घोष से भक्तिमय हो उठा। श्रद्धालुओं ने यशवीर की मातृभक्ति को नमन करते हुए कहा कि आज के समय में ऐसे उदाहरण समाज के लिए प्रेरणा हैं।
यशवीर ने बताया कि यह उनकी दूसरी कांवड़ यात्रा है। उनका कहना है कि भगवान भोलेनाथ की कृपा और मां के आशीर्वाद से उन्हें यह पुण्य सेवा करने का अवसर मिला है। वह मानते हैं कि माता-पिता की सेवा से बढ़कर कोई तीर्थ और कोई पूजा नहीं होती।
यात्रा के दौरान राहगीर और शिवभक्त यशवीर की पालकी देखकर भावुक हो उठते हैं। अनेक लोग उनके चरण स्पर्श कर उनका उत्साहवर्धन करते हैं और उनकी इस अनूठी शिवभक्ति की मुक्त कंठ से प्रशंसा कर रहे हैं। हर कोई यही कह रहा है कि श्रवण मास में यशवीर ने सेवा, समर्पण और संस्कारों की ऐसी मिसाल पेश की है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनेगी।
इस पुण्य यात्रा में सौरभ, गणेश, श्रवण, मिट्ठू और विनीत सहयोगी के रूप में लगातार उनके साथ चल रहे हैं और यात्रा को सफल बनाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। उनकी टीम भी पूरी निष्ठा और भक्ति के साथ इस सेवा कार्य में जुटी हुई है।
श्रावण मास में यशवीर की यह अनोखी कांवड़ यात्रा न केवल भगवान शिव के प्रति अटूट आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह संदेश भी देती है कि सच्ची भक्ति वही है जिसमें ईश्वर की आराधना के साथ माता-पिता की सेवा और सम्मान भी शामिल हो। आज यशवीर की यह यात्रा हजारों शिवभक्तों के लिए प्रेरणा बन चुकी है और हर कोई उनके उज्ज्वल भविष्य तथा सफल कांवड़ यात्रा की कामना कर रहा है।
