नीरज प्रजापति
सपा कार्यालय के बाहर लगे पोस्टर ने खींचा राहगीरों का ध्यान, चुनावी भरोसे और व्यवस्था पर सवाल उठाने का दावा; सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक चर्चा।
मुजफ्फरनगर। समाजवादी पार्टी कार्यालय के बाहर एक बार फिर लगाए गए राजनीतिक पोस्टर ने शहर के सियासी माहौल को गर्म कर दिया है, इस प्रकरण के फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल भी हो रहे है । हालांकि यह समाजवादी पार्टी कार्यालय कहा का इसकी पुष्टि पोस्टर में नहीं हो पाई हैं। इस बार पोस्टर में किसी लंबे राजनीतिक भाषण के बजाय चुटीली और आसानी से याद रहने वाली तुकबंदी के जरिए भाजपा और चुनाव आयोग को निशाने पर लिया गया है। कार्यालय के आसपास से गुजरने वाले लोगों की नजर जैसे ही पोस्टर पर पड़ी, उसकी चर्चा शुरू हो गई। पोस्टर पर बड़े अक्षरों में लिखा गया है। एक कचौड़ी दो समोसा, जनता को बीजेपी पे नहीं भरोसा। इसके साथ ही दूसरा संदेश एक कचौड़ी दो समोसा, चुनाव आयोग में न करना भरोसा लिखा गया है। पोस्टर में चुनाव आयोग की तस्वीर का इस्तेमाल करते हुए जनता के कथित आक्रोश और चुनावी व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े करने का संदेश दिया गया है।
इस पूरे घटनाक्रम को केवल पोस्टरबाजी तक सीमित नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे आगामी विधानसभा चुनाव से पहले तेज होती राजनीतिक बयानबाजी के सिलसिले की कड़ी के तौर पर देखा जा रहा है। हाल के दिनों में राजनीतिक दल छोटे, तीखे और आसानी से लोगों की जुबान पर चढ़ जाने वाले नारों के जरिए अपनी बात जनता तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। इसी क्रम में “एक कचौड़ी दो समोसा” वाली तुकबंदी भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गई है। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी एक अक्टूबर को लखनऊ में इसी अंदाज में भाजपा पर निशाना साधा था। मुजफ्फरनगर में लगे पोस्टर में खास बात यह है कि एक ही तुकबंदी के जरिए दो अलग-अलग राजनीतिक संदेश सामने रखे गए हैं। पहले संदेश में भाजपा को लेकर जनता के भरोसे पर सवाल उठाया गया है, जबकि दूसरे में सीधे चुनाव आयोग का जिक्र करते हुए चुनावी प्रक्रिया के प्रति अविश्वास का संदेश देने की कोशिश की गई है।
बताया गया है कि यह पोस्टर समाजवादी पार्टी के एक नेता की ओर से लगवाया गया है। पोस्टर के जरिए उठाए गए सवाल और लगाए गए नारे सपा नेता एवं पार्टी के राजनीतिक पक्ष को दर्शाते हैं। चुनाव आयोग की निष्पक्षता या चुनावी प्रक्रिया को लेकर पोस्टर में व्यक्त अविश्वास को स्वतः स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता। फिलहाल सपा कार्यालय के बाहर लगा यह पोस्टर राहगीरों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
