वाराणसी, 08 नवंबर । दीपावली के अवसर पर उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी वाराणसी के मंडुवाडीह स्थित मांडवी तालाब के पश्चिमी छोर पर रविवार को पारंपरिक भेला का मेला सज गया। मेले में शाम ढलने के साथ ही खरीदारों और श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ने लगेगी। यह मेला अपनी अनूठी परंपरा और जंगली फल भेला की बिक्री के लिए खास पहचान रखता है। यहां वाराणसी के अलावा आसपास के जिलों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं।
मेले में भेला फल के साथ ही बांस और लकड़ी से बने पारंपरिक घरेलू सामानों की दुकानें भी सज गई हैं। सूप, दउरी, चलनी, दउरा, लकड़ी की खाट, झाड़ू सहित रोजमर्रा के उपयोग में आने वाली वस्तुओं की खरीदारी के लिए दूर-दराज से लोग पहुंचते हैं। स्थानीय निवासी दिनेश मौर्य और संदीप मौर्य बताते हैं कि भेला का मेला पूरी रात गुलजार रहता है। दीपावली की रात से लेकर सोमवार की सुबह तक खरीदारों का आना-जाना लगा रहता है।
क्षेत्रीय समाजसेवी भोला मिश्र के अनुसार, इस मेले की सबसे बड़ी खासियत भेला नामक जंगली फल है। मान्यता है कि इससे तैयार पारंपरिक औषधि के सेवन से अस्थमा यानी दमा के मरीजों को राहत मिलती है। इसी विश्वास के चलते दूर-दराज के क्षेत्रों से भी लोग भेला खरीदने और इसकी औषधि लेने पहुंचते हैं। हालांकि, भेला फल या इससे तैयार औषधि से अस्थमा के उपचार का कोई वैज्ञानिक अथवा चिकित्सकीय प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
मेले में भेला फल से पारंपरिक औषधि तैयार करने वाले दुकानदारों के अनुसार, जंगलों में मिलने वाले इस फल को पहले उबाला जाता है। इसके बाद इसे देशी घी में मिलाकर दमा के मरीजों को दिया जाता है। इसके बदले दुकानदार मरीजों से अपनी इच्छानुसार रुपये लेते हैं। दुकानदारों का दावा है कि यह औषधि केवल दीपावली की रात से सूर्योदय तक ही उपलब्ध कराई जाती है। यही वजह है कि इस मेले में रातभर लोगों की आवाजाही बनी रहती है। धार्मिक नगरी काशी की लोक परंपराओं से जुड़ा यह मेला आज भी अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है।——-
