नीरज प्रजापति
जिस परिवार के सुख के लिए पूरी जिंदगी खपा दी, उसी परिवार ने आखिरी वक्त में मुंह मोड़ लिया; अजनबियों ने दिया अंतिम कंधा
मुजफ्फरनगर/गाजियाबाद। जिंदगी का सबसे बड़ा दुख शायद गरीबी नहीं, बल्कि अपनों के बीच रहकर भी अकेला हो जाना है। गाजियाबाद के 70 वर्षीय इलेक्ट्रॉनिक कारोबारी राजकुमार सक्सेना की कहानी इसी दर्द को बयां करती है। एक ऐसा व्यक्ति जिसने जिंदगी भर कमाया, परिवार के लिए सपने बुने और अपनों की खुशियों के लिए अपना सुख तक कुर्बान कर दिया, लेकिन जब जिंदगी की शाम आई तो उनके हिस्से में रह गया एकांत, बेबसी और अपनों की बेरुखी।
राजकुमार सक्सेना कभी इलेक्ट्रॉनिक कारोबार की दुनिया में अपनी पहचान रखते थे। करोड़ों की संपत्ति, कारोबार और सुख-सुविधाओं से भरा जीवन उनके पास था। लेकिन यह दौलत उनके लिए सिर्फ दौलत नहीं थी। हर कमाया हुआ रुपया उन्हें अपने परिवार का भविष्य सुरक्षित करने की उम्मीद देता था। बच्चों की जरूरतें पूरी हों, पत्नी को किसी चीज की कमी न हो, घर में खुशियां बनी रहें इन्हीं ख्वाबों के साथ उन्होंने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा गुजार दिया।
शायद उन्होंने कभी सोचा भी नहीं होगा कि जिस परिवार के लिए उन्होंने खुद को खपा दिया, उसी परिवार से एक दिन उनका ऐसा नाता टूट जाएगा कि मौत के बाद भी कोई अपना उनके पास खड़ा नहीं होगा।
गंभीर बीमारी ने जब शरीर को कमजोर कर दिया तो राजकुमार सक्सेना को इटावा के सैफई मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया। करीब एक महीने तक वह जिंदगी और मौत के बीच जूझते रहे। अस्पताल के कमरे में गुजरती हर रात शायद उन्हें अपने घर, अपने बच्चों और अपने परिवार की याद दिलाती रही होगी। बीमारी से लड़ते उस बुजुर्ग के मन में शायद आखिरी उम्मीद यही रही होगी कि कोई अपना आएगा, माथे पर हाथ रखेगा और कहेगा कि आप चिंता मत करो, हम आपके साथ हैं लेकिन वह इंतजार अधूरा रह गया। एक दिन उनकी सांसों ने साथ छोड़ दिया। अस्पताल ने परिवार को सूचना दी, लेकिन बेटा, बेटी और पत्नी अंतिम विदाई देने तक नहीं पहुंचे। बताया गया कि परिवार ने वर्षों पहले उनसे संबंध खत्म होने की बात कही थी। सोचिए, जिस पिता ने बच्चों के बचपन से लेकर उनके भविष्य तक के लिए अपनी जिंदगी लगा दी, उसकी अर्थी उठी तो बेटा कंधा देने नहीं आया। जिस घर में कभी उनकी मेहनत की कमाई से खुशियां आई होंगी, वहां से अंतिम संस्कार के लिए कोई नहीं आया। आखिरकार इटावा की एक NGO के लोग आगे आए। जिनसे राजकुमार सक्सेना का कोई खून का रिश्ता नहीं था, उन्होंने उन्हें अपना समझा और अंतिम संस्कार कराया। अजनबियों ने वह फर्ज निभाया, जिसे उनके अपने रिश्तों ने निभाने से इनकार कर दिया। सबसे ज्यादा झकझोरने वाली बात यह है कि जीवन के अंतिम वर्षों में राजकुमार सक्सेना आर्थिक तंगी के बीच वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर बताए गए, जबकि उनके परिवार से जुड़ी करोड़ों की संपत्ति की बात सामने आई है। दौलत बची रही, संपत्ति बची रही, लेकिन वह इंसान चला गया जिसने यह सब बनाने में अपनी पूरी जिंदगी लगा दी।
राजकुमार सक्सेना की चिता की आग बुझ गई होगी, लेकिन उनकी कहानी एक ऐसा सवाल छोड़ गई है जो शायद हर बेटे-बेटी को खुद से पूछना चाहिए कि
जिस पिता ने उंगली पकड़कर चलना सिखाया, अगर वही पिता बुढ़ापे में आपका हाथ तलाशे तो क्या आप उसका हाथ थामेंगे?। क्योंकि जिंदगी में संपत्ति फिर कमाई जा सकती है, पैसा फिर जुटाया जा सकता है… लेकिन पिता की आखिरी सांस और मां-बाप का आखिरी आशीर्वाद दोबारा कभी नहीं मिलता।
