जोनी शर्मा

मुजफ्फरनगर। सिविल लाइंस स्थित धार्मिक संस्थान विष्णुलोक के ज्योतिषविद् पंडित ललित शर्मा के सुपुत्र पंडित अभिलाष शर्मा ने बताया कि इस वर्ष भाई-बहन के अटूट स्नेह और विश्वास का प्रतीक पावन पर्व ‘रक्षाबंधन’ (श्रावणी पूर्णिमा) 28 अगस्त दिन शुक्रवार को मनाया जाएगा। इस वर्ष रक्षाबंधन पर नहीं रहेगा भद्रा का कोई प्रभाव , धर्मशास्त्रों के अनुसार रक्षाबंधन का पर्व सदैव भद्रा रहित काल और पूर्णिमा तिथि में ही मनाया जाना शास्त्रसम्मत माना गया है। इस दिन भद्रा और शुभ मुहूर्तों का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है ताकि पर्व का पूर्ण फल और शुभता प्राप्त हो सके।

पूर्णिमा तिथि प्रारंभ 27 अगस्त को प्रातः 9 बजकर 08 मिनट से एवं पूर्णिमा तिथि समाप्त 28 अगस्त प्रातः 9 बजकर 48 मिनट पर।

राखी बांधने के श्रेष्ठ एवं शुभ मुहूर्त –

पहला शुभ मुहूर्त –
प्रातः काल 5 बजकर 57 मिनट से 9 बजकर 48 मिनट तक रहेगा।

दूसरा शुभ मुहूर्त –
दोपहर 12 बजकर 18 मिनट से 01 बजकर 55 मिनट तक रहेगा।

पंडित अभिलाष शर्मा ने बताया कि रक्षासूत्र बंधवाते समय भाई का मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए। भाई खाली सिर न बैठें, सिर पर रुमाल या कोई वस्त्र अवश्य रखें।रक्षासूत्र सदैव भाई की दाहिनी कलाई पर ही बांधा जाता है। रक्षाबंधन पर बहन द्वारा भाई की कलाई पर राखी बांधने से पहले मौली (कलावा) बांधना अत्यंत शुभ और मंगलकारी माना गया है। मौली को रक्षा-सूत्र का स्वरूप माना जाता है, जो शुभ संकल्प, मंगलकामना और रक्षा का प्रतीक है। इसके पश्चात राखी बांधते समय तीन गांठें लगाना भी विशेष धार्मिक महत्व रखता है। इन तीन गांठों को ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक माना जाता है—ब्रह्मा जी सृजन, भगवान विष्णु पालन और भगवान शिव संहार एवं परिवर्तन के अधिष्ठाता हैं। साथ ही ये तीन गांठें धर्म, अर्थ और कर्म जैसे जीवन के प्रमुख पुरुषार्थों को दर्शाता है तथा भाई के सुख, समृद्धि, दीर्घायु और मंगल की कामना का प्रतीक मानी जाती हैं। इसलिए राखी की ये तीन गांठें केवल धागे की गांठ नहीं, बल्कि भाई की रक्षा और उसके जीवन में शुभता के लिए किए गए पवित्र संकल्प का प्रतीक हैं।
राखी बांधते समय बहनों को निम्न वैदिक मंत्र का उच्चारण अवश्य करना चाहिए-

” येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वाम् प्रतिबद्धनामि, रक्षे मा चल मा चल ”

रक्षाबंधन का वास्तविक अर्थ –
रक्षाबंधन केवल कलाई पर धागा बांधने का पर्व नहीं है, यह स्नेह, विश्वास, सम्मान और संरक्षण के संकल्प को मजबूत करने का अवसर है।
‘रक्षा’ अर्थात संरक्षण और ‘बंधन’ अर्थात संबंध को दृढ़ करने का संकल्प। इसलिए रक्षा-सूत्र का भाव केवल भाई द्वारा बहन की रक्षा तक सीमित नहीं है। भाई-बहन दोनों एक-दूसरे के सुख, सम्मान, उन्नति और कल्याण के सहभागी हैं।
प्राचीन भारतीय परंपरा में रक्षा-सूत्र का प्रयोग व्यापक अर्थ में मंगल और संरक्षण के संकल्प के लिए भी मिलता है। रक्षाबंधन से जुड़ी इन्द्र-शची की कथा भविष्य पुराण की परंपरा में वर्णित है, जिसमें रक्षा-सूत्र को विजय और संरक्षण की कामना से जोड़ा गया है।

इस वर्ष रक्षाबंधन के पावन पर्व पर चंद्र ग्रहण भी पड़ रहा है परंतु चंद्र ग्रहण भारत में दृश्य ही नहीं होगा अर्थात दिखाई ही नहीं देगा, इसलिए भारत में इसके कारण सूतक मान्य नहीं होगा और रक्षाबंधन के धार्मिक अनुष्ठानों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

रक्षाबंधन हमें यही संदेश देता है कि रिश्तों की वास्तविक शक्ति किसी महंगे उपहार में नहीं, बल्कि विश्वास, सम्मान और जीवन के हर उतार-चढ़ाव में एक-दूसरे का साथ निभाने के संकल्प में होती है।

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