नीरज प्रजापति
भाकियू अराजनैतिक ने लखनऊ में गन्ना विभाग के अपर मुख्य सचिव से की मुलाकात।
बजाज समूह पर बकाया भुगतान के बावजूद गन्ना क्षेत्रफल कम नहीं करने पर उठाए सवाल।
गन्ना सुरक्षण आदेश की समीक्षा और अधिकारियों की जांच की मांग।
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में गन्ना पेराई सत्र की शुरुआत से पहले किसानों ने अपने हक की लड़ाई तेज कर दी है। भारतीय किसान यूनियन अराजनैतिक ने गन्ने का राज्य परामर्शी मूल्य (एसएपी) कम से कम 500 रुपये प्रति कुंतल घोषित करने की मांग उठाते हुए सरकार के सामने किसानों की बढ़ती लागत, चीनी के बाजार मूल्य और गन्ने की घटती पैदावार का मुद्दा रखा है। संगठन के प्रतिनिधिमंडल ने 22 अक्टूबर को लखनऊ स्थित बापू भवन में गन्ना एवं चीनी उद्योग विभाग की अपर मुख्य सचिव वीना कुमारी से मुलाकात कर स्पष्ट किया कि लागत के अनुरूप मूल्य नहीं मिलने से गन्ने की खेती किसानों के लिए लगातार चुनौतीपूर्ण होती जा रही है। इस दौरान प्रतिनिधिमंडल में भारतीय किसान यूनियन अराजनैतिक के राष्ट्रीय प्रवक्ता धर्मेंद्र मलिक और युवा प्रदेश अध्यक्ष दिगंबर सिंह शामिल रहे। संगठन ने मांग की कि पेराई सत्र शुरू होने से पहले गन्ने का नया मूल्य घोषित किया जाए, ताकि किसान आर्थिक नुकसान की आशंका के बीच अपनी फसल और आगामी खेती की योजना बनाने को मजबूर न हों। धर्मेंद्र मलिक ने कहा कि गन्ना उत्तर प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। प्रदेश में लगभग 48 लाख गन्ना किसान परिवार प्रत्यक्ष रूप से इस फसल से जुड़े हैं। इसके अलावा कृषि मजदूरों, परिवहन कारोबारियों, चीनी मिलों, कोल्हू और गुड़ उद्योग की आजीविका भी गन्ने पर निर्भर है। ऐसे में गन्ने का मूल्य तय करते समय किसानों की वास्तविक उत्पादन लागत और चीनी उद्योग से होने वाली आय को ध्यान में रखना जरूरी है। संगठन की ओर से दिए गए मांगपत्र में डीजल, खाद, कीटनाशक, सिंचाई और कृषि मजदूरी की बढ़ती लागत का हवाला दिया गया। किसानों का कहना है कि खेती पर खर्च लगातार बढ़ा है, लेकिन गन्ने के मूल्य में वृद्धि उस अनुपात में नहीं हुई। मांगपत्र में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, 20 जुलाई से 20 अगस्त 2026 के बीच चीनी का औसत खुदरा मूल्य 48.18 रुपये से बढ़कर 55.70 रुपये प्रति किलोग्राम होने का दावा किया गया है। संगठन ने कहा कि चीनी, एथेनॉल, शीरा और अन्य उप-उत्पादों से होने वाली आय का समुचित आकलन करके किसानों को बेहतर मूल्य दिया जाना चाहिए।
480 रुपये में गन्ना खरीद रहे कोल्हू-क्रेशर, मिलों के सामने आपूर्ति की चुनौती
भाकियू अराजनैतिक ने दावा किया कि कई क्षेत्रों में कोल्हू और क्रेशर संचालक गन्ना किसानों को लगभग 480 रुपये प्रति कुंतल तक भुगतान कर रहे हैं। संगठन के मुताबिक, पिछले वर्ष भी कुछ स्थानों पर कोल्हू-क्रेशर संचालकों ने राज्य परामर्शी मूल्य से अधिक दर पर गन्ना खरीदा था। ऐसे में किसानों के सामने सवाल है कि जब वैकल्पिक खरीदार अधिक कीमत दे रहे हैं, तो चीनी मिलों के लिए गन्ने की पर्याप्त आपूर्ति कैसे सुनिश्चित होगी। संगठन ने चेताया कि उचित मूल्य नहीं मिलने पर किसान गन्ने की खेती से दूरी बना सकते हैं। कई किसान पॉपुलर और यूकेलिप्टस जैसी वैकल्पिक फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। इससे आने वाले समय में चीनी मिलों के लिए कच्चे माल की उपलब्धता प्रभावित होने की आशंका भी जताई गई। युवा प्रदेश अध्यक्ष दिगंबर सिंह ने गन्ना सुरक्षण आदेश पर गंभीर आपत्ति जताते हुए उसकी समीक्षा की मांग की। उन्होंने आरोप लगाया कि गन्ना विभाग की नीतियों से सरकारी और सहकारी चीनी मिलों के हित प्रभावित हो रहे हैं। उन्होंने बजाज समूह की मिलों से जुड़े भुगतान के मुद्दे को उठाते हुए कहा कि किसानों की बकाया राशि का समाधान किए बिना गन्ना क्षेत्रफल कम नहीं करने की नीति पर पुनर्विचार होना चाहिए। उन्होंने गन्ना सुरक्षण आदेश तैयार करने की प्रक्रिया की जांच कराने और यदि अनियमितताएं या भ्रष्टाचार सामने आएं तो जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग भी की। संगठन ने कहा कि जलभराव, रेड रॉट और टॉप बोरर जैसे रोगों एवं कीटों के कारण उत्तर प्रदेश में गन्ने की पैदावार प्रभावित होने की आशंका है। महाराष्ट्र में सूखे और ब्राजील में गन्ना उत्पादन में संभावित कमी का हवाला देते हुए किसानों ने चीनी बाजार की परिस्थितियों को भी मूल्य निर्धारण में शामिल करने की मांग की। संगठन का तर्क है कि उत्पादन में गिरावट की आशंका के बीच किसानों को उचित मूल्य मिलना और भी जरूरी हो जाता है। प्रतिनिधिमंडल ने बताया कि अपर मुख्य सचिव वीना कुमारी ने गन्ना मूल्य घोषित करते समय किसानों की मांग पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने और गन्ना सुरक्षण आदेश की समीक्षा के संबंध में आश्वासन दिया।
