नीरज प्रजापति
शहर में फिर लगे दंगों के पोस्टरों से सियासत गरमाई
2013 की कड़वी यादों के बीच पोस्टरों ने बढ़ाई हलचल, माहौल बिगाड़ने की कोशिश या राजनीतिक संदेश।
मुजफ्फरनगर। वर्ष 2013 के सांप्रदायिक दंगों की कड़वी यादें अभी पूरी तरह धुंधली भी नहीं हुई हैं कि सोमवार को शहर के प्रमुख मार्ग पर लगाए गए कथित दंगों से जुड़े पोस्टरों ने राजनीतिक और सामाजिक हलकों में हलचल मचा दी। प्रकाश चौक से रोडवेज बस अड्डे की ओर जाने वाले व्यस्त मार्ग पर अचानक दिखाई दिए इन पोस्टरों को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं।
पोस्टरों के सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर संवेदनशील मुद्दों को फिर से हवा देने की जरूरत क्यों महसूस की गई, शहर में जहां लोग शांति और भाईचारे की उम्मीद कर रहे हैं, वहीं ऐसे पोस्टरों ने राजनीतिक गलियारों में भी हलचल पैदा कर दी है। चर्चाओं के बीच विपक्ष सत्ता पक्ष पर माहौल को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करने का आरोप लगा रहा है, जबकि सत्ता पक्ष से जुड़े लोग इसे विपक्ष की सियासत और जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश बता सकते हैं। हालांकि, पोस्टर किसने लगवाए और उनका वास्तविक उद्देश्य क्या था, यह जांच का विषय है।
विधायकी की जंग में संवेदनशील मुद्दे बने हथियार।
स्थानीय राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज हो गई है कि आगामी चुनावी समीकरणों को देखते हुए पक्ष और विपक्ष दोनों अपने-अपने राजनीतिक आधार को मजबूत करने में जुटे हैं। ऐसे में हिंदू-मुस्लिम जैसे संवेदनशील मुद्दों की राजनीतिक चर्चा तेज होना चिंता का विषय माना जा रहा है। सबसे अहम बात यह है कि मुजफ्फरनगर की पहचान केवल 2013 की घटनाओं से नहीं, बल्कि उसके बाद सामान्य स्थिति बहाल करने और सामाजिक सौहार्द कायम रखने की कोशिशों से भी जुड़ी है। ऐसे में शहर में लगे पोस्टरों ने प्रशासन की जिम्मेदारी भी बढ़ा दी है। इन पोस्टरों के पीछे कौन है, इन्हें किस उद्देश्य से लगाया गया और क्या इनके जरिए शहर के शांत माहौल को प्रभावित करने की कोशिश की गई इसके बारे में पुलिस प्रशासन कार्यवाही करता हैं या फिर ठंडे बस्ते में डालकर लंबी साँस लेगा ये तो भविष्य के गर्भ में ही पल रहा है। मगर फिलहाल तो पोस्टरों ने सियासत गर्म कर दी है और जनता सवाल कर रही है कि विकास की राजनीति होगी या फिर पुराने जख्म कुरेदकर वोटों की फसल काटी जाएगी।
