नई दिल्ली, 24 जून । दिल्ली उच्च न्यायालय ने 15 साल की दुष्कर्म पीड़िता को अपना 26 हफ्ते से ज्यादा के भ्रूण को हटाने की अनुमति दे दी है। जस्टिस मिनी पुष्करणा की वेकेशन बेंच ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट पर ये आदेश देते हुए एम्स अस्पताल को निर्देश दिया कि वो इस खर्च का वहन करे।
दुष्कर्म पीड़िता ने अपने पिता के जरिये उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर भ्रूण को हटाने की अनुमति मांगी थी। याचिका में कहा गया था कि अगर दुष्कर्म पीड़िता इस भ्रूण को जारी रखती है, तो इससे उसे मानसिक आघात पहुंचेगा। सुनवाई के दौरान दुष्कर्म पीड़िता की ओर से पेश वकील ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 21 जीने का अधिकार देता है। अगर याचिकाकर्ता के भ्रूण को हटाने की अनुमति नहीं दी जाती है तो वो मानसिक रुप से परेशान हो जाएगी, क्योंकि वो एक दुष्कर्म पीड़िता है।
उन्होंने कहा कि स्टैंडिंग ऑपरेटिंग प्रोसीजर के मुताबिक नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता के भ्रूण को हटाने के लिए न्यायिक आदेश की जरुरत होगी। कोर्ट ने एम्स अस्पताल की ओर से गठित मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट पर गौर किया, जिसमें भ्रूण को हटाने पर सहमति दी गई थी। रिपोर्ट में कहा गया था कि नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता भ्रूण को हटाने के लिए जरूरी प्रक्रिया के लिए चिकित्सकीय रुप से फिट है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सरकारी वकील संजय लाव से पूछा कि आपको कोई आपत्ति तो नहीं है। तब संजय लाव ने कहा कि नहीं। उसके बाद कोर्ट ने दुष्कर्म पीड़िता के भ्रूण को हटाने की अनुमति देते हुए एम्स अस्पताल को इसका खर्च वहन करने का आदेश दिया। उच्च न्यायालय ने एम्स को भ्रूण का डीएनए संरक्षित रखने का आदेश दिया, ताकि इस मामले में दर्ज आपराधिक कार्यवाही में आरोपित के खिलाफ कार्रवाई में सहूलियत हो।
