नीरज प्रजापति

पांच साल से उत्पीड़न और दो लाख रुपये मांगने के आरोप लगाकर सपा के पूर्व प्रदेश सचिव ने उठाए सवाल; दूसरी ओर IAS अधिकारी के पिता को हनीट्रैप में फंसाने की साजिश के आरोप में पहले दर्ज हो चुकी है प्राथमिकी।

बागपत। उत्तर प्रदेश के बागपत में घर के बाहर लगे ‘मकान बिकाऊ है’ के पोस्टरों ने एक पुराने विवाद को फिर सुर्खियों में ला दिया है। मामला पश्चिम बंगाल में तैनात एक आईएएस अधिकारी के पिता और समाजवादी पार्टी के पूर्व प्रदेश सचिव शफीक सलमानी से जुड़े विवाद का है। घर के बाहर पोस्टर लगने के बाद इस प्रकरण ने नया मोड़ ले लिया है। एक तरफ सलमानी उत्पीड़न और रुपये मांगने के आरोप लगा रहे हैं, तो दूसरी तरफ आईएएस अधिकारी के पिता को कथित हनीट्रैप में फंसाकर धन ऐंठने की कोशिश के मामले में सलमानी समेत दस लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज होने की खबर पहले सामने आ चुकी है। ऐसे में इस पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच और दोनों पक्षों के दावों की पड़ताल अहम हो गई है। सलमानी का आरोप है कि उन्हें पिछले करीब पांच वर्षों से परेशान किया जा रहा है। उनका दावा है कि विवाद के दौरान उन्हें झूठे मुकदमों में फंसाने की कोशिश हुई और उनसे दो लाख रुपये की मांग भी की गई। उन्होंने शिकायतों के बावजूद राहत नहीं मिलने की बात कहते हुए मकान के बाहर बिक्री और पलायन से संबंधित पोस्टर लगाए। उनके इस कदम ने स्थानीय स्तर पर चर्चा तेज कर दी है। हालांकि, उत्पीड़न और धन मांगने के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है। संबंधित पक्ष का जवाब और जांच के निष्कर्ष सामने आने के बाद ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगी। इस विवाद का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू आईएएस अधिकारी के पिता से जुड़ा कथित हनीट्रैप प्रकरण है। जनवरी 2026 में प्रकाशित मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, उन्हें कथित तौर पर जाल में फंसाकर धन वसूलने की कोशिश के मामले में शफीक सलमानी समेत दस लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी। रिपोर्टों में दो आरोपियों की गिरफ्तारी की जानकारी भी दी गई थी। पुलिस की ओर से दर्ज प्राथमिकी में लगाए गए आरोपों और उनकी अंतिम सत्यता के बीच अंतर समझना जरूरी है। किसी के खिलाफ मुकदमा दर्ज होना अपने आप में दोष सिद्ध होने का प्रमाण नहीं है। इस मामले में सभी संबंधित पक्षों की भूमिका का निर्धारण जांच और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही होना चाहिए। घर के बाहर लगे पोस्टरों ने मामले को सार्वजनिक बहस का विषय बना दिया है। अब अहम सवाल यह है कि दोनों पक्षों के बीच विवाद की असल वजह क्या है, रुपये मांगने और उत्पीड़न के आरोपों में कितनी सच्चाई है तथा पहले दर्ज मुकदमे में जांच कहां तक पहुंची है। प्रशासन और पुलिस के लिए जरूरी है कि दोनों पक्षों की शिकायतों, उपलब्ध साक्ष्यों और संबंधित रिकॉर्ड की निष्पक्ष पड़ताल की जाए। पोस्टरों के पीछे की परिस्थितियों से लेकर दर्ज प्राथमिकी तक, हर पहलू की जांच ही इस विवाद की वास्तविक तस्वीर सामने ला सकती है।

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