तहसील मुख्यालयों पर दस्तावेज लेखक, स्टांप विक्रेता और अधिवक्ताओं का संयुक्त मोर्चा
पांच सूत्रीय मांगों को लेकर सरकार पर साधा निशाना
मुजफ्फरनगर। उत्तर प्रदेश के रजिस्ट्रेशन विभाग की नई नीतियों के विरोध में प्रदेशभर के तहसील मुख्यालयों पर चल रहा आंदोलन अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। दस्तावेज लेखक, स्टांप विक्रेता और अधिवक्ताओं के संयुक्त संगठन संयुक्त संघर्ष समिति ने सरकार की नीतियों को आम जनता, किसानों, मजदूरों और मध्यमवर्गीय परिवारों के हितों के खिलाफ बताते हुए आंदोलन को और तेज करने का ऐलान किया है।
गुरुवार को मेरठ रोड स्थित होटल मधुबन में मीडिया सेंटर के पत्रकारों के साथ संयुक्त संघर्ष समिति के पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं ने प्रेस वार्ता का आयोजन किया। इस दौरान समिति के पदाधिकारियों ने कहा कि उत्तर प्रदेश के रजिस्ट्रेशन विभाग की नई नीतियों के विरोध में आंदोलन अब केवल दस्तावेज लेखकों और स्टांप विक्रेताओं तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि प्रदेश के लगभग 70 प्रतिशत आम नागरिकों की समस्याओं और परेशानियों का प्रतीक बन चुका है। उनका आरोप है कि नई व्यवस्थाओं के कारण सबसे अधिक आर्थिक और प्रशासनिक बोझ आम जनता पर पड़ रहा है। इस दौरान संयुक्त संघर्ष समिति के अध्यक्ष एडवोकेट योगेंद्र कंबोज ने बताया कि आंदोलन से संबंधित मांगों का विस्तृत ज्ञापन नगर विधायक एवं राज्य मंत्री कपिल देव अग्रवाल, मंत्री अनिल कुमार तथा जिलाधिकारी के माध्यम से मुख्यमंत्री को भेजा गया है। मांग पत्र के माध्यम से मुख्यमंत्री से पूरे मामले का संज्ञान लेकर प्रभावित वर्गों को राहत देने, रोजगार बचाने तथा आगामी चुनावों से पूर्व जनता में बढ़ रहे असंतोष को दूर करने के लिए तत्काल हस्तक्षेप करने की मांग की गई है। संयुक्त संघर्ष समिति का आरोप है कि दस्तावेज लेखन एवं पंजीकरण की नई व्यवस्था ने इस व्यवसाय से जुड़े हजारों लोगों के सामने रोजगार का गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। समिति का कहना है कि पूरी तरह पेपरलेस और ऑनलाइन व्यवस्था लागू किए जाने के बावजूद पोर्टल पर पर्याप्त तकनीकी संसाधन उपलब्ध नहीं हैं। आरोप है कि पंजीकरण पोर्टल पर बार-बार आने वाली तकनीकी समस्याओं के कारण रजिस्ट्री कार्य प्रभावित हो रहा है, जिससे सरकार के राजस्व पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। कई बार सर्वर और वेबसाइट कई दिनों तक बंद रहने से पक्षकारों के सौदे निरस्त हो जाते हैं और ऑनलाइन जमा की गई फीस समय पर वापस नहीं मिलती। समिति ने मांग की है कि ऑनलाइन भुगतान के साथ-साथ पूर्व की व्यवस्था के अनुरूप अन्य भुगतान विकल्प भी उपलब्ध कराए जाएं तथा ऑनलाइन आवेदन पत्रों की वैधता अवधि कम से कम 120 दिन या चार माह की जाए, रियल टाइम खतौनी व्यवस्था से जुड़ी हुई है। संघर्ष समिति का कहना है कि पुरानी व्यवस्था की तुलना में नई प्रणाली से आम जनता का खर्च और परेशानी दोनों बढ़े हैं। समिति का कहना है कि नई व्यवस्था के तहत तैयार की जा रही खतौनियों में 50 से 60 प्रतिशत तक त्रुटियां सामने आ रही हैं, जिसके कारण लोगों को बार-बार तहसीलों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। समिति ने मांग की है कि इन त्रुटियों के निस्तारण के लिए कानूनगो, तहसीलदार और उप जिलाधिकारी स्तर पर निश्चित समय सीमा तय की जाए तथा शिकायतों के निपटारे के लिए अलग ऑनलाइन पोर्टल विकसित किया जाए। इसके अलावा मांग दस्तावेजों के सुरक्षित संरक्षण से संबंधित है। समिति का कहना है कि पंजीकरण के बाद यदि किसी व्यक्ति के मूल दस्तावेज खो जाते हैं या नष्ट हो जाते हैं तो उनकी प्रमाणित प्रतिलिपि प्राप्त करना बेहद कठिन हो जाता है। इसी समस्या को देखते हुए समिति ने मांग की है कि पुराने और नए सभी लेखपत्रों का सुरक्षित डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जाए और उन्हें ऑनलाइन अपलोड किया जाए, ताकि आवश्यकता पड़ने पर नागरिकों को आसानी से प्रमाणित प्रतियां उपलब्ध कराई जा सकें। वहीं स्टांप व्यवस्था से जुड़ी हुई है। समिति का आरोप है कि ऑनलाइन स्टांप वितरण प्रणाली लागू होने के बाद स्टांप विक्रेताओं का कमीशन कम कर दिया गया है, जबकि इस व्यवस्था का संचालन कर रही निजी कंपनी को पर्याप्त आर्थिक लाभ दिया जा रहा है।
समिति का कहना है कि स्टांप विक्रेताओं को कंप्यूटर, प्रिंटर, ऑपरेटर और अन्य संसाधनों पर भारी निवेश करना पड़ रहा है, लेकिन इसके बावजूद उनका कमीशन घटा दिया गया है। इससे हजारों लोगों के रोजगार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इसके अलावा उन्होंने मांग की है कि वर्तमान शुल्क दरें लगभग 40 से 45 वर्ष पहले निर्धारित की गई थीं, जबकि अब पूरी प्रक्रिया कंप्यूटरीकृत और ऑनलाइन हो चुकी है। महंगाई और संचालन लागत में कई गुना वृद्धि होने के बावजूद शुल्क में कोई यथोचित संशोधन नहीं किया गया है। समिति ने सरकार से मांग की है कि दस्तावेज लेखन शुल्क की नई और संशोधित सूची तत्काल प्रभाव से जारी की जाए ताकि इस कार्य से जुड़े लोगों को आर्थिक राहत मिल सके।
संयुक्त संघर्ष समिति ने उनकी सभी मांगों को समाज के विभिन्न वर्गों का व्यापक समर्थन मिलने का दावा किया है और आंदोलन लगातार गति पकड़ने का दावा भी किया गया है। समिति ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने शीघ्र सकारात्मक निर्णय नहीं लिया तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा।
पत्रकार वार्ता में एडवोकेट योगेंद्र कंबोज, हाजी कमरुज्जमा, एडवोकेट हेमंत अरोरा, एडवोकेट संजय शिवम, एडवोकेट मनोज पाल, रवि जैन, किशनचंद कंबोज, रजनीत त्यागी, अशोक त्यागी, कुलदीप गुप्ता, शशिकांत शर्मा, अभिनव मित्तल, अशोक माहेश्वरी, विजय कुमार, नूर मोहम्मद सहित बड़ी संख्या में अधिवक्ता, दस्तावेज लेखक और स्टांप विक्रेता उपस्थित रहे।

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