फर्रुखाबाद, 30 सितंबर । उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले के कायमगंज में पितृपक्ष के अवसर पर पूर्वजों की पुण्य स्मृति में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन बुधवार को कथा व्यास श्री शिवानंद भाईश्री महाराज ने श्रद्धालुओं को धर्म, भक्ति, सत्संग और आत्मसंयम का संदेश दिया। उन्होंने महाराज परीक्षित के प्रसंग के माध्यम से कहा कि क्षणिक क्रोध और अहंकार मनुष्य के जीवन की दिशा बदल सकते हैं।
कथा का शुभारंभ नैमिषारण्य में शौनकादि ऋषियों और सूतजी के संवाद से हुआ। कथा व्यास ने कहा कि भगवान की कथा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन को संस्कारित करने और मनुष्य को परमात्मा की ओर ले जाने का माध्यम है।
कथा में महाराज परीक्षित के चरित्र का वर्णन करते हुए उन्होंने बताया कि परीक्षित धर्मपरायण और प्रजावत्सल राजा थे। एक बार शिकार के दौरान भूख-प्यास से व्याकुल होकर वे शमीक ऋषि के आश्रम पहुंचे। ऋषि के समाधि में लीन होने के कारण उत्तर न मिलने पर राजा ने इसे अपना अपमान समझ लिया और क्षणिक आवेश में मृत सर्प उनके गले में डाल दिया।
इस घटना से क्रोधित ऋषि पुत्र शृंगी ने परीक्षित को सातवें दिन तक्षक नाग के दंश से मृत्यु का श्राप दे दिया। शमीक ऋषि ने पुत्र के इस कठोर दंड पर दुख जताया और इसे राजा की क्षणिक भूल के लिए अनुचित बताया।
भाईश्री महाराज ने कहा कि परीक्षित प्रसंग मनुष्य को क्रोध और अहंकार से बचने की सीख देता है। भूल का बोध होने पर पश्चाताप और भगवान की शरण ही जीवन को सही दिशा देती है। इसी प्रसंग से आगे परीक्षित को श्रीशुकदेव जी के मुख से श्रीमद्भागवत कथा श्रवण का अवसर मिलता है।
