बिजनौर। सनातन परंपरा में कुछ तिथियाँ केवल पर्व नहीं होतीं, बल्कि वे दिव्य ऊर्जा के विशेष क्षण होती हैं। वैशाख शुक्ल तृतीया—अक्षय तृतीया—ऐसा ही एक अवसर है, जब प्रकृति, ग्रह और आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्भुत संतुलन निर्मित होता है।
सिविल लाइंस स्थित धार्मिक संस्थान विष्णुलोक के ज्योतिषविद पंडित ललित शर्मा के पुत्र पंडित अभिलाष शर्मा ने बताया कि वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला अक्षय तृतीया सनातन परंपरा के अत्यंत पवित्र और स्वयं सिद्ध पर्वों में गिना जाता है। ‘अक्षय’ का अर्थ है—जो कभी क्षीण न हो, अर्थात इस दिन किए गए शुभ कर्म, दान, जप, तप और पुण्य कार्यों का फल स्थायी और दीर्घकालिक माना जाता है। यही कारण है कि इसे अबूझ मुहूर्त कहा गया है, जिसमें किसी भी प्रकार के शुभ कार्य—जैसे विवाह, गृह प्रवेश, व्यापार आरंभ या निवेश—बिना विशेष मुहूर्त के भी किए जा सकते हैं। वर्ष 2026 में यह पावन तिथि 19 अप्रैल, रविवार को मनाई जाएगी। पंचांग के अनुसार तृतीया तिथि 19 अप्रैल को प्रातः 10 बजकर 49 मिनट से प्रारंभ होकर 20 अप्रैल प्रातः 7 बजकर 27 मिनट तक रहेगी।
ज्योतिषीय दृष्टि से अक्षय तृतीया का महत्त्व अत्यंत विशेष माना गया है। इस दिन सूर्य मेष राशि में तथा चंद्रमा वृषभ राशि में उच्च स्थिति में माने जाते हैं। सूर्य आत्मबल, ऊर्जा और नेतृत्व का कारक है, जबकि चंद्रमा मन, शांति और स्थिरता का प्रतीक है। जब ये दोनों प्रमुख ग्रह अपने-अपने उच्च स्थान में होते हैं, तब जीवन में ऊर्जा और संतुलन का अद्भुत समन्वय बनता है। यही कारण है कि इस तिथि को आरंभ किए गए कार्यों में स्थायित्व और सकारात्मक परिणामों की संभावना अधिक मानी जाती है।
अक्षय तृतीया से अनेक महत्वपूर्ण धार्मिक और पौराणिक प्रसंग जुड़े हैं, जो इस तिथि की महत्ता को और अधिक गहराई प्रदान करते हैं। इस दिन भगवान परशुराम का जन्मोत्सव मनाया जाता है, जिन्हें धर्म की स्थापना और संतुलन के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। इसी तिथि को त्रेतायुग के आरंभ की मान्यता भी प्राप्त है, जिसमें आगे चलकर भगवान श्रीराम का अवतार हुआ और उन्होंने मर्यादा, सत्य और आदर्श जीवन का मार्ग स्थापित किया। उत्तराखंड स्थित बद्रीनाथ धाम के कपाट भी सामान्यतः इसी दिन खोले जाते हैं, जो यह संकेत देते हैं कि भक्ति और तीर्थयात्रा के द्वार पुनः खुल रहे हैं।
महाभारत काल से जुड़े प्रसंग भी इस तिथि की विशेषता को दर्शाते हैं। मान्यता है कि महर्षि वेदव्यास ने इसी दिन भगवान गणेश को महाभारत का लेखन प्रारंभ कराया, जो ज्ञान और बुद्धि के दिव्य संगम का प्रतीक है। इसी प्रकार वनवास के दौरान भगवान श्रीकृष्ण द्वारा द्रौपदी को अक्षय पात्र प्रदान करने का उल्लेख मिलता है, जो यह दर्शाता है कि ईश्वरीय कृपा से जीवन में आवश्यक संसाधनों की कभी कमी नहीं होती।
धार्मिक आचरण की दृष्टि से अक्षय तृतीया का विशेष महत्व है। इस दिन अन्न, जल, वस्त्र और अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। मंत्र जप, विशेष रूप से “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का उच्चारण, आध्यात्मिक उन्नति में सहायक माना गया है। पवित्र नदियों में स्नान और पितरों के निमित्त तर्पण करने की भी परंपरा है। आधुनिक समय में इस दिन स्वर्ण क्रय की परंपरा भी व्यापक रूप से प्रचलित है, किंतु इसका मूल भाव केवल भौतिक संग्रह नहीं, बल्कि स्थायित्व, शुद्धता और समृद्धि के प्रतीक के रूप में समझा जाता है।
अंततः, अक्षय तृतीया केवल एक पर्व नहीं, बल्कि जीवन में सकारात्मक आरंभ, संतुलन और सत्कर्मों की निरंतरता का संदेश देने वाली तिथि है। यह हमें प्रेरित करती है कि जब सही समय पर शुद्ध भाव से किया गया कर्म जीवन में जुड़ता है, तो उसका प्रभाव क्षणिक नहीं, बल्कि अक्षय हो जाता है। इसी भाव के साथ यह पावन पर्व मानव जीवन को उन्नति, संतुलन और आध्यात्मिक समृद्धि की दिशा प्रदान करता है।

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