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वाराणसी, 22 मार्च । उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी वाराणसी (काशी)में वांसतिक चैत्र नवरात्र का चौथा दिन सुख-समृद्धि व सौभाग्य की प्रदात्री मां श्रृंगार गौरी और जगदम्बा कुष्मांडा को समर्पित है। परम्परानुसार श्रद्धालुओं ने रविवार को आदिशक्ति के नवदुर्गा स्वरूप दुर्गाकुंड स्थित कुष्मांडा दरबार और ज्ञानवापी परिक्षेत्र स्थित गौरी स्वरूप स्वयंभू विग्रह श्रृंगार गौरी के दरबार में हाजिरी लगाई। मां कुष्मांडा के दरबार में दर्शन पूजन के लिए लोग भोर से ही दुर्गाकुंड पहुंचने लगे। यह क्रम देर शाम तक चलता रहेगा। दोनों मंदिरों में भक्त सच्चे दरबार की जय, मां शेरा वाली के जयकारे भी लगाते रहे। चैत्र नवरात्र के चौथे दिन वर्ष भर में एक दिन के लिए खुलने वाले श्रृंगार गौरी के दरबार में दर्शन पूजन के लिए आम श्रद्धालुओं के साथ शिवसेना के कार्यकर्ता उत्साहित दिखे। चौक स्थित चित्रा सिनेमा के समीप जुटे शिवसैनिक माता रानी के दरबार में जाने की तैयारी पूर्वांह से ही कर रहे थे। श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के प्रतिबंधित क्षेत्र में मां श्रृंगार गौरी का विग्रह होने के कारण सुरक्षा का व्यापक प्रबंध किया गया है। उधर,श्रृंगार गौरी ज्ञानवापी मामले में मुकदमा से जुड़ी वादी महिलाएं और उनके अधिवक्ता और समर्थकों ने मैदागिन स्थित गोरक्षनाथ मंदिर क्षेत्र से श्रृंगार गौरी के दर्शन के लिए यात्रा निकाली। यह यात्रा जुलूस (शोभायात्रा) के रूप में निकली और जयकारे लगाते हुए सभी कड़ी सुरक्षा के बीच ज्ञानवापी परिसर तक पहुंचे । और माता श्रृंगार गौरी का विधि विधान से श्रृंगार किया और आरती पूजन किया।

बताते चले ज्ञानवापी परिक्षेत्र के अति संवेदनशील क्षेत्र में स्थित मां श्रृंगार गौरी का मंदिर वर्ष में एक दिन चैत्र नवरात्र के चौथे दिन ही खुलता है। ज्ञानवापी परिसर में मस्जिद के पीछे माता रानी का विग्रह हैं। काशी में मान्यता है कि माता रानी के स्वयंभू विग्रह के दर्शन से महिलाओं का श्रृंगार वर्ष भर बना रहता है। आम तौर पर सामान्य दिनों में श्रृंगार गौरी को लाल वस्त्र से ढककर रखा जाता है, लेकिन चैत्र नवरात्र में चौथे दिन एक दिन के लिए उन्हें मुखौटा व लाल चुनरी से सुशोभित किया जाता है। नवरात्र के चौथे दिन दुर्गाकुंड स्थित कुष्मांडा स्वरूप का दर्शन पूजन होता है। जगदम्बा के इस रूप के दर्शन-पूजन से सारी बाधा, विध्न और दुखों से छुटकारा मिलता है। साथ ही भवसागर की दुर्गति को भी नहीं भोगना पड़ता है। मां की आठ भुजाएं हैं। इनके सात हाथों में क्रमशः कमण्डल, धनुष, बाण, कमल पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र और गदा है। मां कुष्मांडा` विश्व की पालनकर्ता के रूप में भी जानी जाती हैं। माता रानी के इस स्वरूप के बादे में मान्यता है कि जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था। चहुंओर अंधकार व्याप्त था उसी समय माता ने अपने ‘ईषत’ हस्त से सृष्टि की रचना की थी। देश के प्राचीनतम देवी मंदिरों में से एक इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि दुर्गम दानव शुम्भ-निशुंभ का वध करने के बाद थकी आदि शक्ति ने यहां विश्राम किया था। तब काशी का यह इलाका दुर्गम और वनाच्छादित था। इस मंदिर का जिक्र ‘काशी खंड’ में भी है।

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