औरैया, 10 अगस्त । उत्तर प्रदेश के औरैया/इटावा जनपद में यमुना और चंबल की कल-कल करती धाराओं के संगम के बीच चंबल के बीहड़ों में स्थित भारेश्वर महादेव मंदिर धार्मिक आस्था के साथ इतिहास की अनमोल विरासत को भी संजोए हुए है। मंदिर की घंटियों की गूंज, प्राचीन स्थापत्य और आसपास बिखरे किले के अवशेष बीते समय की गौरवगाथा सुनाते हैं। मान्यता है कि महाभारत काल में अज्ञातवास के दौरान पांडवों में भीम ने यहां शिवलिंग की स्थापना की थी। यही वजह है कि भारी संख्या में श्रद्धालुओं के लिए यह स्थान आज भी विशेष आस्था का केंद्र है।
जमीन से करीब 444 फीट की ऊंचाई पर स्थित भारेश्वर महादेव मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को 108 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। मंदिर की प्राचीन बनावट, ऊंचा शिखर और पंचायतन शैली की मोटी दीवारें इसकी स्थापत्य कला की भव्यता को दर्शाती हैं। मंदिर को लेकर स्थानीय स्तर पर कई ऐसी मान्यताएं प्रचलित हैं, जो इसे अन्य धार्मिक स्थलों से अलग पहचान देती हैं।
डाकुओं के दौर में भी नहीं टूटी आस्था
चंबल घाटी कभी डाकुओं के आतंक के लिए जानी जाती थी। बीहड़ों में कानून का खौफ कम और बागियों का प्रभाव अधिक हुआ करता था। इसके बावजूद भारेश्वर महादेव के दर्शन और पूजा-अर्चना का सिलसिला कभी नहीं थमा। कठिन परिस्थितियों में भी शिवभक्त मंदिर पहुंचते रहे। स्थानीय लोगों के अनुसार, एक दौर ऐसा भी था जब चंबल के डाकू स्वयं मंदिर में आकर भगवान शिव की पूजा-अर्चना करते थे। बाद में 20वीं शताब्दी में डाकुओं के प्रभाव का अंत हुआ, लेकिन मंदिर की धार्मिक महत्ता लगातार बढ़ती गई।
नाविक की प्रार्थना और मंदिर का जीर्णोद्धार
मुगलकाल में जब नदियों के रास्ते व्यापार का बड़ा माध्यम हुआ करता था, तब भरेह उत्तर भारत के प्रमुख व्यापारिक केंद्रों में शामिल था। इसी दौर से जुड़ी एक मान्यता के अनुसार, राजस्थान के व्यापारी मदनलाल की नाव एक बार यमुना के भंवर में फंस गई। नाव डूबने की आशंका के बीच व्यापारी ने भारेश्वर महादेव से प्रार्थना की। कुछ देर बाद नाव सुरक्षित किनारे पहुंच गई। इसके बाद उन्होंने भगवान शिव के प्रति आभार व्यक्त करते हुए मंदिर का जीर्णोद्धार कराया।
विद्वानों और संतों की साधना स्थली
वरिष्ठ पत्रकार हरेंद्र राठौर बताते हैं कि मान्यता है कि विद्वान नीलकंठ ने कर्मकांड एवं दंड से संबंधित 12 मयूख ग्रंथों तथा आयुर्वेदिक ग्रंथों की रचना इसी मंदिर में रहकर की थी। बनारस के विद्वान नीलकंठ भट्ट ने ‘भगवन्त भास्कर’ नामक ग्रंथ में भी भारेश्वर महादेव की महिमा का वर्णन किया है।
मंदिर का संबंध संत परंपरा से भी जुड़ा रहा
मान्यता है कि गोस्वामी तुलसीदास ने यहां कुछ समय प्रवास किया था। परमहंस गुंधारी लाल ने भारेश्वर महाराज की तपस्या के बाद ग्राम बडेरा को अपना कर्मक्षेत्र बनाया। वहीं परमहंस पुरुषोत्तम दास महाराज ने अन्न और जल त्यागकर भगवान भोलेनाथ की तपस्या की थी।
स्वतंत्रता संग्राम से भी जुड़ीं हैं मंदिर की यादें
भारेश्वर मंदिर का स्वतंत्रता संग्राम से भी घर नाता जुड़ा बताया जाता है। स्थानीय पत्रकार धर्मेंद्र सेंगर के अनुसार, भरेह के राजा रूपसिंह ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध इसी क्षेत्र में सेना के प्रशिक्षण की व्यवस्था की थी। एक लोकमान्यता यह भी है कि अंग्रेजों ने जब मंदिर को घेर लिया था, तब मंदिर से निकले ‘बरों’ के कारण उन्हें पीछे हटना पड़ा था। इन घटनाओं की ऐतिहासिक पुष्टि अलग विषय है, लेकिन स्थानीय जनमानस में इनकी स्मृतियां आज भी जीवित हैं।
सावन के दूसरे सोमवार को उमड़ा श्रद्धा का सैलाब
सावन के दूसरे सोमवार को भारेश्वर महादेव मंदिर में श्रद्धा का सैलाब उमड़ पड़ा। सुबह से ही यमुना-चंबल के संगम क्षेत्र में हर-हर महादेव और बम-बम भोले के जयघोष गूंजते रहे। आसपास के गांवों के साथ दूर-दराज क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान शिव के दर्शन और जलाभिषेक के लिए पहुंचे। 108 सीढ़ियां चढ़कर श्रद्धालुओं ने भारेश्वर महादेव का पूजन किया और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की। मंदिर में धार्मिक आयोजनों के दौरान ग्रामीणों के साथ प्रशासन की भी भागीदारी रहती है।
यमुना और चंबल के संगम पर स्थित भारेश्वर महादेव मंदिर आज केवल पूजा-अर्चना का स्थल नहीं, बल्कि पौराणिक आस्था, संत परंपरा, प्राचीन स्थापत्य और चंबल की ऐतिहासिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। बीहड़ों की खामोशी के बीच सदियों से जल रहा आस्था का यह दीप आज भी श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है।
