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नैनीताल, 15 मई । दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ.राजमंगल यादव ने भारतीय दर्शन और शैवदर्शन की आध्यात्मिक चेतना पर व्याख्यान कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि भारतीय दर्शन केवल सैद्धान्तिक चिंतन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संतुलित, नैतिक और मूल्यनिष्ठ जीवन की दृष्टि प्रदान करता है।

कुमाऊं विश्वविद्यालय के डीएसबी परिसर स्थित विजिटिंग प्रोफेसर निदेशालय एवं संस्कृत विभाग के संयुक्त तत्वावधान में ‘भारतीय ज्ञान परम्परा और शैवदर्शन’ विषय पर संगोष्ठी काे बताैर मुख्य वक्ता कार्यक्रम काे डॉ.राजमंगल यादव संबोधित कर रहे थे।

मुख्य वक्ता डॉ. राजमंगल यादव ने भारतीय दर्शन और शैवदर्शन की आध्यात्मिक चेतना पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन केवल सैद्धान्तिक चिंतन नहीं बल्कि संतुलित, नैतिक और मूल्यनिष्ठ जीवन की दृष्टि प्रदान करता है। उन्होंने शिवतत्त्व को चेतना और सार्वभौमिक कल्याण का प्रतीक बताते हुए विद्यार्थियों से भारतीय ज्ञानपरम्परा के मूल स्रोतों के गंभीर अध्ययन का आह्वान किया।

कार्यक्रम में डॉ. हेम चंद्र जोशी ने निदेशक प्रो. ललित तिवारी के निर्देशानुसार संगोष्ठी की रूपरेखा एवं उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए अतिथियों और प्रतिभागियों का स्वागत किया। संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रो. लज्जा भट्ट ने भारतीय ज्ञान परम्परा को विश्व मानवता के लिए प्रेरणा एवं नैतिक मार्गदर्शन का स्रोत बताते हुए संस्कृत साहित्य के संरक्षण और समकालीन प्रासंगिकता पर बल दिया। कार्यक्रम का संचालन भावना कांडपाल ने किया तथा समापन शान्तिपाठ के साथ हुआ।

कार्यक्रम में प्रो. एचसीएस बिष्ट, प्रो. आशीष तिवारी, डॉ. प्रदीप कुमार, डॉ. नीता आर्या, डॉ. सुषमा जोशी, प्रो. रीना सिंह, प्रो. लता पांडे, प्रो. अनीत पांडे, प्रो. दीपक पालीवाल, डॉ. गगन, डॉ. मनोज बाफिला, डॉ. नवीन पाण्डे, डॉ. हर्ष सहित अनेक प्राध्यापक एवं शोधार्थी उपस्थित रहे।

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