नीरज प्रजापति
मुजफ्फरनगर। जिंदगी का सबसे खूबसूरत एहसास तब शुरू होता है, जब इंसान दूसरों की नजरों में अच्छा बनने की कोशिश छोड़कर खुद की नजरों में बेहतर बनना सीख जाता है। क्योंकि दुनिया का तो दस्तूर ही अजीब है, आप कुछ भी कर लीजिए, किसी के लिए अच्छे होंगे तो किसी के लिए बुरे। किसी को आपका आत्मविश्वास घमंड लगेगा, तो किसी को आपकी खामोशी कमजोरी। इसलिए हर किसी को खुश करने की कोशिश में खुद को खो देना सबसे बड़ी नासमझी है।
अब जिंदगी का एक ही उसूल है—मैं जैसा हूं, खुद को पसंद हूं और यही मेरे लिए काफी है।
मुझे फर्क नहीं पड़ता कि कौन मेरे बारे में क्या सोचता है, कौन मेरी तारीफ करता है और कौन मेरी बुराई। क्योंकि मेरी जिंदगी का रिमोट किसी और के हाथ में नहीं है। मैंने अपनी कीमत दूसरों की राय से तय करना छोड़ दिया है। जो मुझे समझते हैं, वे बिना समझाए भी समझ जाते हैं और जिन्हें गलत समझना है, उनके सामने हजार सफाई भी बेकार हैं।
मैंने सीखा है कि आत्मसम्मान के साथ जीना, दिखावे की जिंदगी जीने से कहीं बेहतर है। हर किसी के सामने अपनी अच्छाई साबित करना जरूरी नहीं। कुछ जवाब वक्त देता है और कुछ जवाब इंसान की खामोशी दे देती है।
न किसी से मुकाबला, न किसी से शिकायत, न किसी की मंजूरी की जरूरत।
मैं अपनी कमियों के साथ भी खुद को स्वीकार करता हूं, अपनी खूबियों पर गर्व करता हूं और अपनी शर्तों पर जिंदगी जीता हूं।
आखिर में बस इतनी सी बात है, दुनिया को पसंद आना मेरी जिम्मेदारी नहीं, खुद की नजरों में गिरना मेरी फितरत नहीं।
मैं खुद को पसंद हूं, यही काफी है… बाकी दुनिया की सोच जाए भाड़ में!
