नीरज प्रजापति
भगत सिंह रोड पर फिर सजेगा पंच दीपोत्सव का तीन दिवसीय मेला, छोटे कारोबारियों की एकजुटता और हौसले ने बचाई सैकड़ों परिवारों की उम्मीदें, चंद रुपयों की रोजी-रोटी के लिए सड़क पर उतरे व्यापारियों की संघर्षगाथा बनी मिसाल।
मुजफ्फरनगर। किसी के लिए दीपावली रोशनी, मिठाइयों और खुशियों का त्योहार हो सकता है, लेकिन शहर के उन सैकड़ों रेहड़ी-पटरी कारोबारियों के लिए यह त्योहार पूरे साल की उम्मीदों और परिवार के चूल्हे की आग से जुड़ा होता है। इसी उम्मीद को बचाने के लिए पिछले 24 घंटे से चल रही जद्दोजहद आखिरकार रंग लाई। छोटे कारोबारियों के हौसले, एकजुटता और अपने हक के लिए डटे रहने के जज्बे के सामने शासन-प्रशासन को आखिरकार अपना फैसला बदलना पड़ा। अब शहर के व्यस्ततम भगत सिंह रोड पर पूर्व की भांति पंच दीपोत्सव के अवसर पर तीन दिवसीय मेले का आयोजन किया जा सकेगा।
दरअसल, भगत सिंह रोड पर वर्षों से पंच दीपोत्सव के अवसर पर तीन दिवसीय मेले का आयोजन होता आ रहा है। इस मेले में बड़ी संख्या में रेहड़ी-पटरी लगाने वाले छोटे कारोबारी अपने सामान की दुकानें सजाते हैं। पूरे साल इस आयोजन का इंतजार करने वाले इन कारोबारियों के लिए यह महज तीन दिनों का बाजार नहीं, बल्कि परिवार की जरूरतें पूरी करने और बच्चों के चेहरों पर मुस्कान लाने का एक बड़ा अवसर होता है। लेकिन इस बार कुछ व्यापारियों की आपत्तियों के चलते प्रशासनिक स्तर पर मेले के आयोजन पर रोक लगाने का प्रयास किया गया तो उन छोटे कारोबारियों की उम्मीदों पर संकट के बादल छा गए, जिनकी रोजी-रोटी का बड़ा सहारा यही आयोजन है। देखते ही देखते मामला सिर्फ मेले की अनुमति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सैकड़ों परिवारों की आजीविका और सम्मान से जुड़ा सवाल बन गया। इसके बाद रेहड़ी कारोबारियों ने हार मानने के बजाय अपने हक की आवाज बुलंद की। करीब 24 घंटे तक लगातार चली जद्दोजहद में उन्होंने अपनी पीड़ा और आर्थिक मजबूरियों को सामने रखा। उनका सवाल साफ था कि साल में त्योहार के मौके पर मिलने वाले इन चंद दिनों के रोजगार से यदि उन्हें वंचित कर दिया गया तो उनके परिवारों की खुशियां कैसे बरकरार रहेंगी। आखिरकार कारोबारियों की मांग और उनके संघर्ष का असर दिखाई दिया। शासन-प्रशासन को पूर्व की व्यवस्था के अनुसार भगत सिंह रोड पर तीन दिवसीय मेले के आयोजन की अनुमति देनी पड़ी। फैसले के बाद उन छोटे कारोबारियों के चेहरों पर राहत और खुशी दिखाई देने लगी, जिनकी आंखों में पिछले 24 घंटे से अनिश्चितता और चिंता थी। बता दे कि त्योहारों की असली खुशी केवल बड़े बाजारों और चमकदार दुकानों तक सीमित नहीं होती। फुटपाथ पर सामान बेचने वाले उस छोटे कारोबारी के लिए भी दीपावली उतनी ही महत्वपूर्ण है, जो अपनी मेहनत की कमाई से बच्चों के लिए नए कपड़े और घर में मिठाई लाने का सपना देखता है। असलियत में दीपावली की रोशनी तभी मुकम्मल होती हैं जब बड़े व्यापारियों के साथ छोटे कारोबारियों के घरों में भी खुशियों के दीप जलते हैं।
