नोयडा। मुजफ्फरनगर में दो बार जिलाधिकारी रहकर लोकप्रियता हासिल करने वाले डॉ. योगेन्द्र नारायण के द्वारा लिखित पुस्तक ‘समर्पित जान सेवा: सत्ता के राजनैतिक खेल’ का आज उनके 84वे जन्मदिन पर लोकार्पण हुआ।
डॉ योगेन्द्र नारायण ने अपनी इस पुस्तक रूपी आत्मकथा में जन्म से लेकर शिक्षा एवं कार्य क्षेत्र उतार- चढ़ाव, अपने शोंक और राजनैतिक खेलों का उल्लेख किया है 26 जून 1942 में मेरठ में श्री कृपा नारायण माथुर के परिवार में जन्में योगेन्द्र नारायण की शिक्षा- दीक्षा प्रयागराज में हुई। यहीं से प्रेरणा लेते हुए माता-पिता की इच्छानुसार आईएएस में उनकी 10वी और आईएफएस में 9वी रेंक आई। लेकिन उन्होंने आईएएस को चुना। मुजफ्फरनगर में दो बार, अलीगढ़, लखनऊ सहित कई जिलों में जिलाधिकारी रहने के बाद वे उत्तर प्रदेश में मुख्य सचिव भी रहे। सभी खेलों में रुचि रखने वाले योगेन्द्र नारायण को घुड़सवारी का भी शोंक था। यही नहीं उन्होंने केंद्र में रक्षा सचिव, राज्यसभा में महासचिव जैसे महत्वपूर्ण पदों पर भी कार्य किया। विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए राजनीतिक खेलों को भी करीब से देखा। नसबंदी कांड में मुजफ्फरनगर के लोगों का दर्द बांटा तो आपातकाल में उन्ही नेताओं को जेल भेजा, जिनके साथ काम किया। उत्तर प्रदेश विभाजन में उत्तराखंड के हिस्से आदि दायित्वों को उन्हें सौंपा तो नेशनल हाईवे के संस्थापक बने। बावरिया समुदाय के उत्थान के लिए कार्य किया। फ़िल्म अभिनेता के साथ भी नूरा कुश्ती की। उन्होंने अपनी आत्मकथा में सभी कुछ खोलकर रख दिया। यह भी लिखा है कि किस तरह से उनके पिता को प्रयागराज नगर पालिका के कार्यपालक अधिकारी बनाया गया। परिवार से दूर रहकर 1965 से ही जनसेवा के कार्यों को प्रार्थमिकता दी और एक ही जिले में दो ताकतवर नेताओं पर कैसे पार पाया।

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