कल्पना कीजिए कि डॉक्टर आपको पेट की जांच के लिए एंडोस्कोपी या दर्दनाक टेस्ट की जगह सिर्फ एक छोटी सी कैप्सूल निगलने को कहें। सुनने में यह भविष्य की तकनीक लगती है, लेकिन अब यह हकीकत बनने की ओर बढ़ रही है। बेल्जियम और नीदरलैंड्स के वैज्ञानिकों ने मिलकर GISMO (Gastrointestinal Smart Module) नाम की एक अत्याधुनिक तकनीक विकसित की है। यह माउथ फ्रेशनर जैसी दिखने वाली छोटी कैप्सूल है, जिसमें माइक्रोचिप, केमिकल सेंसर और वायरलेस ट्रांसमीटर लगे होते हैं।
हर 20 सेकंड में भेजेगा पेट का अपडेट
यह स्मार्ट कैप्सूल पेट और आंतों के भीतर यात्रा करते हुए वहां के रासायनिक बदलावों की निगरानी करता है। विशेष सेंसर हर 20 सेकंड में एक नई रीडिंग लेकर मरीज के शरीर के बाहर लगे रिसीवर तक जानकारी पहुंचाते हैं। इससे डॉक्टरों को एसिडिटी, संक्रमण, अल्सर, सूजन और यहां तक कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के शुरुआती संकेत भी समय रहते मिल सकते हैं।
क्यों खास है यह तकनीक?
अब तक पेट की बीमारियों की जांच के लिए एंडोस्कोपी और कोलोनोस्कोपी जैसे परीक्षण किए जाते हैं, जो कई मरीजों के लिए असुविधाजनक, दर्दनाक और महंगे साबित होते हैं। करीब दो दशक पहले विकसित PillCam तकनीक पेट की तस्वीरें तो भेज सकती थी, लेकिन पेट के भीतर होने वाली रासायनिक गतिविधियों और गैसों का विश्लेषण नहीं कर पाती थी। GISMO इस कमी को दूर करता है और केवल तस्वीरें ही नहीं, बल्कि जैव-रासायनिक बदलावों की भी लाइव जानकारी देता है।
खाने योग्य बैटरी भी तैयार
इस तकनीक की सबसे बड़ी चुनौती ऊर्जा आपूर्ति थी। इसके समाधान के लिए इटली के वैज्ञानिकों ने दुनिया की पहली रिचार्जेबल खाने योग्य बैटरी विकसित की है।इस बैटरी को विटामिन B2, केपर्स फल से मिलने वाले क्वेरसेटिन, एक्टिवेटेड चारकोल, समुद्री घास और मधुमक्खी के मोम जैसी प्राकृतिक सामग्रियों से बनाया गया है। वैज्ञानिकों ने टूथपेस्ट में इस्तेमाल होने वाले नीले पिगमेंट की मदद से एक खाने योग्य ट्रांजिस्टर भी तैयार किया है।
कैंसर की शुरुआती पहचान में मदद
विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में यह तकनीक पेट और आंतों से जुड़ी बीमारियों की पहचान का तरीका पूरी तरह बदल सकती है। लगातार मिलने वाले रियल-टाइम डेटा से डॉक्टर बीमारी के शुरुआती संकेत पकड़ सकेंगे, जिससे उपचार जल्दी शुरू किया जा सकेगा और मरीजों की जान बचाने की संभावना बढ़ेगी।वैज्ञानिकों के अनुसार, आने वाले वर्षों में ऐसी निगलने योग्य स्मार्ट डिवाइसें अस्पतालों में आम हो सकती हैं। इससे न केवल जांच आसान होगी बल्कि मरीजों को बार-बार दर्दनाक प्रक्रियाओं से भी नहीं गुजरना पड़ेगा।
