उत्तर प्रदेश में लगातार बढ़ रहे बाल विवाह के मामलों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। एक मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने साफ कहा कि सूबे में बाल विवाह के मामलों में इसलिए बढ़ोतरी हो रही है क्योंकि यूपी पुलिस इन अवैध शादियों के दूल्हों और मददगारों के खिलाफ बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 के तहत सख्त कार्रवाई करने में नाकाम साबित हुई है। न्यायालय ने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि अब तक ऐसा एक भी मामला रिकॉर्ड पर नहीं आया है, जहां पुलिस ने इस अधिनियम की धारा 10 और 11 का इस्तेमाल कर नाबालिग लड़की से शादी करने वाले पुरुष या उस विवाह को संपन्न कराने वाले बिचौलियों, पंडितों/मौलवियों या सगे-संबंधियों पर मुकदमा दर्ज किया हो।

DGP को सख्त निर्देश: जारी करें गाइडलाइंस
यह तल्ख टिप्पणी अदालत ने आजाद अंसारी की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए की। मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को फौरन कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि डीजीपी राज्य के सभी पुलिस कमिश्नरों, एसएसपी और एसपी को स्पष्ट गाइडलाइंस और सर्कुलर जारी करें, ताकि जमीन पर बाल विवाह के खिलाफ प्रभावी एक्शन दिख सके। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि पुलिस को जैसे ही किसी बाल विवाह की भनक लगे—चाहे वह किसी शिकायत के जरिए हो, जांच के दौरान सामने आए या पुलिस को खुद पता चले—बिना किसी देरी के अधिनियम की धारा 10 और 11 के तहत एफआईआर दर्ज कर कानूनी प्रक्रिया शुरू कर देनी चाहिए।

बाल विवाह उन्मूलन केवल कानूनी नहीं, संवैधानिक जिम्मेदारी
अदालत ने याचिकाकर्ता की एफआईआर को रद्द करने से साफ इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि मामले में लगाए गए आरोप बेहद गंभीर हैं और आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त सबूत मौजूद हैं, जिससे संज्ञेय अपराध बनता दिखाई देता है। अदालत ने इस दौरान प्रशासनिक सुस्ती पर चोट करते हुए कहा कि बाल विवाह जैसी सामाजिक बुराई को खत्म करना सिर्फ एक वैधानिक औपचारिकता या कानूनी उद्देश्य नहीं है, बल्कि यह संविधान के तहत राज्य सरकार की एक बड़ी जिम्मेदारी और अनिवार्यता है। अदालत ने पाया कि जांच अधिकारी (IO) अक्सर मामले की गंभीरता को नजरअंदाज कर देते हैं और दूल्हे व विवाह कराने वालों के खिलाफ जरूरी धाराओं का इस्तेमाल ही नहीं करते। इसी ढिलाई की वजह से ऐसे अपराध करने वालों के हौसले बुलंद हैं और कानून का खौफ खत्म हो रहा है।

उम्र के प्रमाण पर कोर्ट की बड़ी टिप्पणी: अंतिम दस्तावेज नहीं है आधार
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने उन सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं को भी कटघरे में खड़ा किया जो ऐसी शादियों को बढ़ावा देती हैं। कोर्ट ने कहा कि कई संस्थाएं बच्चियों की उम्र का सत्यापन करने के लिए सिर्फ आधार कार्ड या किसी हलफनामे (Affidavit) को आधार बना लेती हैं, जो कि पूरी तरह गलत है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि आधार कार्ड में दर्ज जन्मतिथि को किसी भी व्यक्ति की वास्तविक उम्र का अंतिम और वैध प्रमाण नहीं माना जा सकता। संस्थाओं को किसी भी विवाह को संपन्न कराने या सर्टिफिकेट जारी करने से पहले उम्र के पुख्ता और कानूनी रूप से मान्य दस्तावेजों की जांच करनी चाहिए।

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