पानी बंटवारे को लेकर हरियाणा-पंजाब में फिर ठन गई है। आप शासित पंजाब अपनी जरूरतों और मौजूदा जल स्तर को लेकर भाजपा शासित हरियाणा को अतिरिक्त पानी देने का विरोध कर रहा है।

हरियाणा अपने हिस्से का साढे तीन मिलियन एकड़ फीट पीने का पानी सतलुज-यमुना लिंक नहर को देने की मांग कर रहा है, और पंजाब को सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करने की हिदायत भी दे रहा है जबकि पंजाब लगातार साझा करने के लिए अतिरिक्त पानी न होने की दुहाई दे रहा है। 214 किमी. लंबी इस नहर की परिकल्पना रावी-ब्यास नदियों के जल को दोनों राज्यों के दरम्यान बांटने के लिए की गई थी जिसमें 122 किमी. पंजाब में और बाकी 92 किमी. हरियाणा में बनाया जाना था।

हरियाणा परियोजना को पूरा कर चुका है, जबकि पंजाब ने 1982 से चालू इस निर्माण को लटका कर रखा है। पंजाब सरकार का कहना है, धान की बुआई के मौसम में उसे अतिरिक्त पानी की जरूरत है, और यह भी कि हरियाणा अपने हिस्से का पानी पहले ही ले चुका है। हरियाणा 8,500 क्यूसेक पानी की मांग कर रहा है, जबकि पंजाब उसे चार हजार क्यूसेक पानी पीने के लिए मुहैया करा रहा है। जल बंटवारे के विवाद को राजनीति से प्रेरित बताया जा रहा है।

पंजाब ने हरियाणा पर केंद्र में अपनी सरकार होने के चलते उसे जबरन दबाने के प्रयास के आरोप भी लगाए हैं। नदियों के जल-बंटवारे को लेकर देश भर में अंतरराज्यीय विवादों की स्थिति बनी रहती है। केंद्र और शीर्ष अदालत के हस्तक्षेप के बावजूद राज्यों के दरम्यान संतुलित बंटवारा संभव नहीं हो सका है। राज्यों के बीच जल बंटवारे को लेकर न सिर्फ तनाव बढ़ता है, बल्कि सामाजिक, आर्थिक व पर्यावरणीय संकट भी बढ़ता जाता है।

केंद्र का जिम्मा है कि पंजाब सरकार को उक्त नहर के निर्माण के लिए राजी करे और जितनी मदद हो सके देने की व्यवस्था भी करे। विभिन्न राज्यों को नदियों के जल बंटवारे के लिए भिड़ने की बजाय जल संरक्षण, भूजल के सदुपयोग और बरसाती पानी के भंडारण के समुचित सुझाव भी दिए जाएं। पूर्वाग्रहों और व्यवस्थागत विकल्पों के अभाव में उपज पर पड़ने वाली मार तथा पेयजल संकट देश का अहितकारी साबित हो सकता है। केंद्र को न सिर्फ विवाद को तूल पकड़ने से रोकना होगा, बल्कि राजनीतिक मन-मुटाव को हाशिए पर रखते हुए मानसून पूर्व ही विवाद का निस्तारण का भी प्रयास करना होगा।

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