नई दिल्ली, 06 अक्टूबर । उच्चतम न्यायालय ने शिवसेना विवाद मामले पर सुनवाई के दौरान पूछा कि क्या शिवसेना का धनुष बाण चुनाव चिह्न उन सांसदों-विधायकों को मिलना चाहिए, जिनके खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही चल रही है? मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने मंगलवार को सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। कोर्ट 7 अक्टूबर को भी इस मामले पर सुनवाई जारी रखेगी।
सुनवाई के दौरान एकनाथ शिंदे गुट के वकील नीरज किशन कौल ने कहा कि निर्वाचन आयोग ने सांसदों और विधायकों की राय के आधार पर फैसला किया है, जो सही है। इस पर जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने पूछा कि क्या शिवसेना का धनुष बाण चुनाव चिह्न उन सांसदों-विधायकों को मिलना चाहिए, जिनके खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही चल रही है? इस पर कौल ने उच्चतम न्यायालय के कई फैसलों का हवाला दिया, जिसमें बहुमत के आधार पर पार्टी सिम्बल आवंटित किए गए।
इसके पहले सुनवाई के दौरान शिवसेना उद्धव ठाकरे गुट की ओर से कहा गया था कि निर्वाचन आयोग की ओर से एकनाथ शिंदे गुट को शिवसेना नाम और धनुष बाण का चिह्न आवंटित करने का फैसला गैरकानूनी था। निर्वाचन आयोग के फैसले ने पार्टी के लोकतंत्र को कमतर आंकते हुए मूल पार्टी से अलग हुए विधायकों को इनाम दे दिया। उद्धव गुट की ओर से कहा गया था कि विधायक दल में बहुमत का ये मतलब नहीं है कि उनका पूरी पार्टी और संगठन पर कब्जा होगा। निर्वाचन आयोग ने बागी गुट को मान्यता देने से मुख्य पार्टी के सदस्यों और संगठन के प्रतिनिधियों की आवाज को दबा दिया गया। सुनवाई के दौरान एकनाथ शिंदे गुट की ओर से कहा गया कि उनके पास ही पार्टी संगठन और विधायकों के बीच वास्तविक बहुमत है और निर्वाचन आयोग का फैसला कानून को ध्यान में रखकर किया गया है।
उद्धव ठाकरे गुट की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा था कि शिवसेना नियमों से चलने वाली पार्टी है और ये पार्टी जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 29ए के तहत हर छोटे-बड़े बदलाव की जानकारी निर्वाचन आयोग को देती है। उन्होंने कहा था कि पार्टी के नियमों के मुताबिक पार्टी प्रमुख को चुनने का अधिकार सिर्फ राष्ट्रीय कार्यकारिणी के पास है। सिब्बल ने कहा कि बागी गुट ने बिना कोई लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाए ही पार्टी प्रमुख को हटा दिया और खुद कुर्सी पर बैठ गए, जो कि शिवसेना के संविधान का सीधा उल्लंघन था।
