कांग्रेस ने गृह मंत्री अमित शाह के लद्दाख दौरे को लेकर शुक्रवार को उन पर निशाना साधते हुए कहा कि वह पिपरहवा अवशेषों की महिमा में मग्न हैं, लेकिन वह लद्दाख के लोगों की राज्य के दर्जे, संविधान की छठी अनुसूची के तहत संरक्षण प्रदान करने तथा भूमि एवं रोजगार की सुरक्षा संबंधी मांगों पर चुप हैं। कांग्रेस महासचिव एवं संचार प्रभारी जयराम रमेश ने भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा जुलाई 1949 में किए लद्दाख दौरे का भी जिक्र किया।

रमेश ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर कहा, ”गृह मंत्री आज लद्दाख में पिपरहवा अवशेषों की महिमा में मग्न हैं लेकिन वह वहां के लोगों की राज्य के दर्जे, संविधान की छठी अनुसूची के तहत दर्जा तथा भूमि एवं रोजगार की सुरक्षा की मांगों पर चुप हैं।” रमेश ने कहा कि शाह को लद्दाख में पहले हुए ऐसे आयोजनों की जानकारी नहीं होगी। उन्होंने कहा कि बुद्ध के दो प्रमुख शिष्यों अरहंत सारिपुत्र और अरहंत महा मौद्गल्यायन के पवित्र अवशेषों को ब्रिटिश 1851 में सांची स्तूप से ले गए थे और उन्हें लंदन के ‘विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम’ में रखा गया था तथा इन अवशेषों को 14 जनवरी, 1949 को नेहरू को वापस दिया गया था और उन्हें उसी दिन कोलकाता स्थित ‘महाबोधि सोसाइटी ऑफ इंडिया’ को सौंप दिया था।

रमेश ने कहा, ”कुछ महीने बाद जुलाई 1949 की शुरुआत में यानी बिहार सरकार द्वारा बोधगया मंदिर अधिनियम, 1949 पारित किए जाने के तुरंत बाद नेहरू ने लद्दाख का चार दिवसीय दौरा किया। इस दौरान पूज्य कुशक बकुला रिनपोछे ने नेहरू से अनुरोध किया था कि ये अवशेष लद्दाख भी भेजे जाएं।” उन्होंने कहा कि एक साल बाद मई 1950 में यह संभव हुआ और इन अवशेषों को 79 दिन तक लद्दाख में अलग-अलग स्थानों पर ले जाया गया। कांग्रेस ने बृहस्पतिवार को भी लद्दाख के लोगों की मांगों पर ”सरकार की चुप्पी” पर सवाल उठाते हुए कहा था कि उसे केंद्र से संविधान की छठी अनुसूची के तहत संरक्षण प्रदान करने और राज्य का दर्जा देने की मांग पर अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए लद्दाख में बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर गौतम बुद्ध के अवशेषों को लोगों के दर्शन के लिए रखे जाने के कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए शाह बृहस्पतिवार को वहां पहुंचे थे।

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