लघु सिंचाई विभाग के करोड़ों के प्रोजेक्ट में छेद, बच्चों की जिंदगी में खामोशी, निरमाना मांग रहा इंसाफ

तालाब की लापरवाही ने छीनी चार जानें, निरमाना गांव आज भी दर्द में डूबा

मनोज पाल (9911711593)

मुजफ्फरनगर। जनपद के बघरा ब्लॉक के निरमाना गांव में एक ऐसा तालाब है, जिसकी कहानी सिर्फ पानी और मिट्टी की नहीं, बल्कि लापरवाही, अनियमितताओं और चार बुझी हुई जिंदगियों की है। इस तालाब का सौंदर्यीकरण लघु सिंचाई विभाग द्वारा किया गया था। ग्रामीणों ने विभाग पर न सिर्फ निर्माण कार्यों में घोर लापरवाही, बल्कि वित्तीय अनियमितताओं के भी गंभीर आरोप लगाए हैं। गांव में आज भी यह सवाल हवा में तैरता है कि करोड़ो का बजट पास हुआ, फिर भी सुरक्षा के इंतजाम अधूरे क्यों रहे ? ग्रामीणों के अनुसार तालाब के सौंदर्यीकरण ने एक नहीं, चार जिंदगियां निगल लीं। गांव का हर शख्स जानता है कि जो हादसे हुए, वे किसी प्राकृतिक दुर्घटना का नतीजा नहीं थे, बल्कि उन गहरे गड्ढों का परिणाम थे जिन्हें बिना किसी सुरक्षा व्यवस्था के छोड़ दिया गया था।

7 जून 2023 की वो शाम गांव आज भी कोई नहीं भूल पाया है। शाम के लगभग साढ़े सात बजे मोनू त्यागी तालाब किनारे था तभी अचानक वे तालाब में बने एक गहरे गड्ढे में फिसलकर जा गिरा। लोग दौड़े, खोजबीन हुई, पर मौत पहले पहुंच चुकी थी। ग्रामीणों ने काफी मशक्कत के बाद मोनू का शव बाहर निकाला था। मोनू त्यागी परिवार का इकलौता बेटा था। पीछे बूढ़े मां-बाप रह गए, जो आज भी इस सवाल के साथ जी रहे हैं कि अगर सुरक्षा के मूल इंतजाम किए गए होते तो उनका बेटा आज जिंदा होता। ग्रामीणों के अनुसार तालाब की मरम्मत और सौंदर्यीकरण के दौरान लघु सिंचाई विभाग ने पानी को रोकने के लिए 10-15 फीट गहरे कई गड्ढे खोदे थे। काम में बाधा न आए, इसलिए पानी उन्हीं में जमा किया जाता था। परंतु इन्हें न तो भरा गया, न किसी रस्सी, खंभे, चेतावनी पट्ट या सुरक्षा अवरोध से चिन्हित किया गया था।

गांव के लोग बताते हैं कि यह हादसा अकेला नहीं था। इसी तालाब में तीन मासूम बच्चों नदीम (8 वर्ष), फरीदा (11 वर्ष) और सानू (10 वर्ष) की भी दर्दनाक मौत हो चुकी है। ग्रामीण आज भी बताते हैं कि दो बच्चियों को जब तालाब से बाहर निकाला गया, तो दोनों एक-दूसरे को कसकर पकड़े हुए थीं, जैसे आखिरी सांस तक एक-दूसरे को संभालने की कोशिश की हों। इस दृश्य ने पूरे गांव को दहला दिया था।ग्रामीणों का स्पष्ट आरोप है कि तालाब के सौंदर्यीकरण में घोर लापरवाही हुई थी। करोड़ो रुपये खर्च होने के बाद भी न चारदीवारी बनी, न सुरक्षा। जब आरटीआई के माध्यम से जानकारी ली गई तो विभाग ने स्वयं स्वीकार किया कि तालाब के जीर्णाेद्धार के लिए खसरा 309 पर 73.33 लाख रुपये और खसरा 282 पर 91.51 लाख रुपये स्वीकृत हुए थे। ग्रामीणों का सवाल है कि इतना बजट कहां खर्च हुआ? और यदि हुआ तो सुरक्षा व्यवस्था क्यों गायब थीं?

इन मौतों के बाद मोनू त्यागी के पिता सुरेंद्र त्यागी दो महीने तक स्थानीय प्रशासन के चक्कर लगाते रहे। वे बार-बार कहते रहे कि उनके बेटे की मौत किसी दुर्घटना नहीं, बल्कि विभागीय लापरवाही का नतीजा है। लेकिन उनकी सुनवाई नहीं हुई। मजबूर होकर उन्होंने माननीय उच्च न्यायालय प्रयागराज का रुख किया। अदालत में भी महीनों गुज़रते गए, लेकिन कोई संतोषजनक कार्रवाई नहीं दिखाई दी। जब आरटीआई का जवाब सामने आया तब जाकर उच्च न्यायालय में उन्हें न्याय की उम्मीद नजर आयी। ग्रामीणों का मानना है कि कागजों में सौंदर्यीकरण पूरा दिखाया गया, लेकिन ज़मीन पर सिर्फ खतरा और मौत छोड़ी गई।उच्च न्यायालय ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए दो बार मुजफ्फरनगर के जिलाधिकारी को तलब किया है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार जिलाधिकारी स्वयं भी विभाग की कार्यप्रणाली से नाराज हैं। तालाब का निर्माण तत्कालीन अधिशासी अभियंता आलोक कुमार सिन्हा और अवर अभियंता पवन कुमार की निगरानी में हुआ था। आज भी गांव निरमाना का माहौल बदला नहीं है। चार मौतों की छाया आज भी उन रास्तों पर महसूस होती है, जो तालाब की ओर जाते हैं। लोगों का कहना है कि लापरवाही ने हमारे बच्चों को छीन लिया। अगर आज भी कोई जिम्मेदारी तय नहीं हुई, तो कल फिर कोई परिवार उजड़ जाएगा।

“मामले की जांच जारी है। कोर्ट में भी विषय विचाराधीन है। तीन सदस्यीय कमेटी जांच कर रही है। जांच के बीच ज्यादा टिप्पणी नही कि जा सकती।”

जितेंद्र सैनी सहायक अभियंता, लघु सिंचाई विभाग

“प्रशासन ने अब तक उच्च न्यायालय में कोई संतोषजनक जवाब प्रस्तुत नहीं किया है। उच्च न्यायालय दो बार जिलाधिकारी को तलब कर चुका है। यदि अगली सुनवाई पर भी संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया, तो हाईकोर्ट स्वतंत्र प्राधिकरण से जांच का आदेश दे सकता है।”

विपिन त्यागी, प्रयागराज उच्च न्यायालय में मामले की पैरवी कर रहे अधिवक्ता

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