आम आदमी पार्टी (AAP) के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा अक्सर संसद में महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दे उठाते हैं। हाल ही में राघव ने संसद में पैटर्निटी लीव का मुद्दा छेड़ा है। उन्होंने भारत में ‘पैटर्निटी लीव’ (पितृत्व अवकाश) को कानूनी अधिकार बनाने की पुरज़ोर वकालत की है। सांसद ने तर्क दिया कि बच्चे के जन्म के बाद उसकी देखभाल की ज़िम्मेदारी केवल माँ पर नहीं डाली जानी चाहिए।

परवरिश साझा ज़िम्मेदारी, कानून में हो बदलाव

सदन को संबोधित करते हुए राघव चड्ढा ने कहा,जब बच्चा पैदा होता है, तो बधाई दोनों माता-पिता को दी जाती है, लेकिन देखभाल का पूरा बोझ अकेले माँ पर आ जाता है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि पिता को अपने नवजात बच्चे की देखभाल और नौकरी में से किसी एक को चुनने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। चड्ढा के अनुसार, डिलीवरी के बाद रिकवरी के दौरान एक महिला को अपने पति के भावनात्मक और शारीरिक सहयोग की सबसे अधिक आवश्यकता होती है।

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अदालत ने भी माना पिता का रोल अहम

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच (जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन) ने भी एक मामले की सुनवाई के दौरान टिप्पणी की थी कि बच्चे के विकास में पिता की भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी माँ की। कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि पेरेंटिंग एक साझा जिम्मेदारी है।

भारत में वर्तमान स्थिति

वर्तमान में भारत में निजी क्षेत्र के लिए पैटर्निटी लीव को लेकर कोई विशिष्ट कानून नहीं है। यह पूरी तरह कंपनी की पॉलिसी पर निर्भर करता है। केंद्रीय सिविल सेवा (अवकाश) नियम, 1972 के तहत पुरुष सरकारी कर्मचारियों को 15 दिनों का सवैतनिक अवकाश मिलता है। स्वीडन, नॉर्वे और आइसलैंड जैसे देशों में माता-पिता के लिए साझा और अनिवार्य अवकाश के कड़े नियम हैं। स्वीडन में तो 480 दिनों तक की ‘पैरेंटल लीव’ का प्रावधान है।

 

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