आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों को देखते हुए कांग्रेस ने एक बार फिर बसपा प्रमुख मायावती के करीब जाने की रणनीति बनानी शुरू कर दी है। चूंकि कांग्रेस इस समय समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में है, इसलिए उसके शीर्ष नेता खुलकर मायावती से संपर्क नहीं कर सकते थे। ऐसे में कांग्रेस से जुड़े कुछ दलित नेताओं के माध्यम से मायावती तक पहुंचने की कोशिश की गई, लेकिन मायावती ने इस प्रयास को पूरी तरह विफल कर दिया। लखनऊ स्थित अपने आवास पर पहुंचे कांग्रेस नेताओं को उन्होंने मिलने का समय तक नहीं दिया। इस घटनाक्रम ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में नए संकेत दे दिए हैं।

दरअसल मंगलवार शाम कांग्रेस के अनुसूचित जाति विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेंद्र पाल गौतम और कांग्रेस सांसद तनुज पुनिया मायावती से मिलने उनके आवास पहुंच गए। बताया गया कि उनके साथ कुछ अन्य दलित नेता भी थे। हालांकि उन्हें मायावती से मिलने का समय नहीं मिला और पूरा प्रयास असफल हो गया। बाद में कांग्रेस नेतृत्व ने खुद को इस घटनाक्रम से अलग दिखाने की कोशिश की और दोनों नेताओं को नोटिस जारी कर दिया। पार्टी ने इसे अनधिकृत और निजी मुलाकात बताकर राजनीतिक नुकसान को सीमित करने का प्रयास किया।

कांग्रेस के लिए यह स्थिति इसलिए भी असहज हो गई क्योंकि उसी समय राहुल गांधी रायबरेली और अमेठी के दौरे पर थे तथा दलित समाज से जुड़े कार्यक्रमों में भाग ले रहे थे। हम आपको याद दिला दें कि राहुल गांधी पहले भी सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर चुके हैं कि पिछले विधानसभा चुनावों के दौरान उन्होंने मायावती को गठबंधन का प्रस्ताव दिया था। राहुल गांधी ने यह भी कहा था कि उन्होंने मायावती को मुख्यमंत्री पद तक की पेशकश की थी, लेकिन बसपा प्रमुख ने प्रस्ताव ठुकरा दिया था। इसके बाद कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के साथ हाथ मिलाया और लोकसभा चुनावों में इस गठबंधन को अपेक्षाकृत अच्छा परिणाम मिला। अब जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, कांग्रेस के भीतर फिर यह सोच मजबूत होती दिखाई दे रही है कि बसपा को साथ लाए बिना भाजपा के खिलाफ व्यापक सामाजिक समीकरण तैयार करना कठिन होगा।

लेकिन यह कोशिश ऐसे समय हुई है जब समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव लगातार यह कह रहे हैं कि उनका मौजूदा गठबंधन आगे भी जारी रहेगा। लखनऊ में आयोजित एक कार्यक्रम में अखिलेश यादव ने स्पष्ट कहा कि भविष्य के चुनावों में भी सहयोगियों के साथ गठबंधन बना रहेगा और उसका आधार सीटों की सौदेबाजी नहीं बल्कि जीत का लक्ष्य होगा। उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी गठबंधन चलाना जानती है और उसने कभी अपने सहयोगियों को धोखा नहीं दिया। अखिलेश का यह बयान सीधे तौर पर कांग्रेस के लिए भी संदेश माना गया, क्योंकि राजनीतिक गलियारों में लगातार यह चर्चा चल रही थी कि कांग्रेस समानांतर राजनीतिक विकल्प तलाश रही है।

उधर, कांग्रेस नेताओं की मायावती से मुलाकात की असफल कोशिश ने इन अटकलों को और तेज कर दिया। कांग्रेस की ओर से सफाई दी गई कि यह केवल शिष्टाचार भेंट थी और नेताओं ने मायावती के स्वास्थ्य का हाल जानने के लिए जाने का फैसला किया था। लेकिन राजनीतिक जानकार इसे सहज घटना मानने को तैयार नहीं हैं। खासकर तब, जब कांग्रेस नेतृत्व ने इतनी तेजी से नोटिस जारी कर दूरी बनाने की कोशिश की। इससे साफ संकेत मिलता है कि पार्टी को डर था कि समाजवादी पार्टी इस घटनाक्रम को संदेह की नजर से देख सकती है।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह भी चर्चा है कि कांग्रेस सत्ता और राजनीतिक अवसरों के लिए सहयोगी बदलने में कभी देर नहीं लगाती। हाल के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव इसका उदाहरण माने जा रहे हैं। चुनाव के दौरान कांग्रेस द्रमुक के साथ खड़ी थी, लेकिन परिणाम आते ही सत्ता की संभावनाओं को देखते हुए उसने तेजी से पाला बदलकर टीवीके के साथ गठबंधन कर लिया और उसकी सरकार में भी शामिल हो गयी। ऐसे में उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस की वर्तमान सक्रियता को केवल औपचारिक राजनीतिक संपर्क मानना आसान नहीं है।

कुल मिलाकर देखें तो कांग्रेस नेताओं की मायावती से असफल मुलाकात ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। कांग्रेस भले ही इसे निजी पहल बताकर पीछे हटने की कोशिश कर रही हो, लेकिन यह साफ दिखाई दे रहा है कि विधानसभा चुनाव से पहले विपक्षी राजनीति के भीतर नए समीकरणों की तलाश शुरू हो चुकी है। वहीं मायावती ने बिना कुछ कहे यह संकेत दे दिया है कि वह फिलहाल किसी भी राजनीतिक संदेश या दबाव में आने वाली नहीं हैं।

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