अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने कहा है कि अमेरिका (US) और ईरान ( Iran) के बीच परमाणु समझौते की “बहुत अच्छी संभावना” बन रही है। ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है जब उन्होंने ईरान पर प्रस्तावित अमेरिकी सैन्य हमले को अस्थायी रूप से टालने की पुष्टि की है। ट्रंप ने बताया कि यह हमला मंगलवार को होना था, लेकिन सऊदी अरब (Saudi Arabia), कतर (Qatar) और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के नेताओं ने उनसे सैन्य कार्रवाई रोकने का आग्रह किया। इन देशों का कहना था कि तेहरान के साथ “गंभीर बातचीत” चल रही है और कूटनीति को थोड़ा और समय दिया जाना चाहिए।

 

President Trump said there was a ‘very good chance’ the United States could reach an agreement with Iran to prevent Tehran from obtaining a nuclear weapon, hours after saying he had postponed a planned military attack to allow negotiations to continue https://t.co/t7zQvYnri3 pic.twitter.com/TLOWAToFnY

— Reuters (@Reuters) May 19, 2026

ट्रंप ने अपने बयान में कहा, “अगर बिना बमबारी के समाधान निकल सकता है तो मुझे बहुत खुशी होगी।” हालांकि उन्होंने साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि यदि वार्ता विफल होती है तो अमेरिका “पूर्ण पैमाने पर बड़े सैन्य हमले” के लिए तैयार रहेगा। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका की मुख्य मांग यह है कि ईरान कभी भी परमाणु हथियार हासिल न कर सके। वहीं ईरान की ओर से कथित तौर पर एक नया प्रस्ताव भेजा गया है, जिसमें युद्ध समाप्त करने, होर्मुज़ जलडमरूमध्य में सामान्य आवाजाही बहाल करने और प्रतिबंधों में राहत जैसे मुद्दे शामिल बताए जा रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, खाड़ी देशों को डर है कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच फिर युद्ध भड़कता है तो इसका सीधा असर तेल आपूर्ति, समुद्री व्यापार और क्षेत्रीय सुरक्षा पर पड़ेगा। इसी कारण सऊदी अरब, UAE और कतर लगातार मध्यस्थता की कोशिश कर रहे हैं।

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इस बीच वैश्विक बाजारों पर भी इस घटनाक्रम का असर दिखाई दिया। ट्रंप के बयान के बाद कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट देखी गई क्योंकि निवेशकों को उम्मीद जगी कि फिलहाल बड़े युद्ध का खतरा टल सकता है। हालांकि स्थिति अभी भी बेहद नाजुक बनी हुई है। अमेरिकी प्रशासन ने साफ किया है कि सेना को हाई अलर्ट पर रखा गया है और जरूरत पड़ने पर तुरंत कार्रवाई की जा सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल अस्थायी राहत हो सकती है। यदि परमाणु वार्ता में प्रगति नहीं हुई तो मिडिल ईस्ट में तनाव फिर तेजी से बढ़ सकता है, जिसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजारों पर पड़ेगा।

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