अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने एक ऐसे एस्टेरॉयड की पहचान की है जो अगले हफ्ते धरती के बेहद करीब से गुजरने वाला है। इस एस्टेरॉयड का नाम 2026 JH2 रखा गया है। खास बात यह है कि यह अंतरिक्ष चट्टान चांद की दूरी से भी काफी कम दूरी पर दिखाई देगा। हालांकि वैज्ञानिकों ने साफ किया है कि फिलहाल धरती से इसके टकराने का कोई खतरा नहीं है।
कितनी होगी दूरी?
वैज्ञानिकों के अनुसार यह एस्टेरॉयड धरती से लगभग 90 हजार किलोमीटर की दूरी से गुजरेगा। तुलना करें तो चंद्रमा धरती से करीब 3.84 लाख किलोमीटर दूर है। यानी यह एस्टेरॉयड चांद की दूरी के लगभग चौथाई हिस्से जितना पास आएगा। अंतरिक्ष की भाषा में इसे बेहद करीबी फ्लाईबाय माना जाता है।
आखिर क्या होते हैं एस्टेरॉयड?
एस्टेरॉयड अंतरिक्ष में मौजूद चट्टानी पिंड होते हैं जो सूरज के चारों ओर घूमते रहते हैं। ज्यादातर एस्टेरॉयड मंगल और बृहस्पति ग्रह के बीच मौजूद एस्टेरॉयड बेल्ट में पाए जाते हैं। लेकिन कुछ एस्टेरॉयड अपनी कक्षा बदलकर धरती के आसपास पहुंच जाते हैं। इन्हें Near-Earth Objects (NEO) कहा जाता है। 2026 JH2 भी इसी श्रेणी का एस्टेरॉयड है। वैज्ञानिकों के मुताबिक यह Apollo Class Asteroid है, यानी इसकी कक्षा धरती की कक्षा को काटती है।
हाल ही में हुई खोज
इस एस्टेरॉयड को कुछ दिन पहले अमेरिका की ऑब्जरवेटरी टीमों ने खोजा है। शुरुआती जानकारी के अनुसार वैज्ञानिकों ने अब तक इसे सीमित बार ही ट्रैक किया है। इसी वजह से इसकी गति, आकार और भविष्य की दिशा को लेकर लगातार नई गणनाएं की जा रही हैं।
कितना बड़ा है यह एस्टेरॉयड?
अनुमान बताते हैं कि इसका आकार करीब 50 से 100 फीट तक हो सकता है। यानी यह किसी छोटे भवन जितना बड़ा हो सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर इस आकार का एस्टेरॉयड धरती से टकराए तो किसी बड़े शहर को भारी नुकसान पहुंच सकता है। हालांकि राहत की बात यह है कि इसके टकराने की कोई संभावना नहीं दिखाई दे रही है।
वैज्ञानिकों ने क्या कहा?
अंतरिक्ष विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी कम दूरी से किसी एस्टेरॉयड का गुजरना सामान्य नहीं माना जाता, लेकिन यह दूरी अभी भी सुरक्षित कैटेगरी में आती है। कंप्यूटर मॉडल और ऑर्बिटल कैलकुलेशन के आधार पर वैज्ञानिकों ने अगले कई दशकों तक किसी खतरे से इनकार किया है।
क्या लोगों को चिंता करनी चाहिए?
विशेषज्ञों के मुताबिक आम लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है। यह एस्टेरॉयड केवल धरती के पास से गुजरने वाला है और इसका रास्ता लगातार मॉनिटर किया जा रहा है। वैज्ञानिक एजेंसियां हर पल इसकी गतिविधियों पर नजर बनाए हुए हैं।
