पंजाब पुलिस की कार्यप्रणाली और राजनीतिक दबाव के चलते इंसाफ की उम्मीद लगाए बैठे पीड़ितों के सब्र का बांध अब टूटने लगा है। लुधियाना के बहुचर्चित डॉ. सुमित सोफत लूट व अपहरण मामले में पुलिस की 11 साल की ‘सुस्ती’ और लापरवाही पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने इस पूरे घटनाक्रम को ‘चिंताजनक’ करार देते हुए पंजाब के डीजीपी से व्यक्तिगत तौर पर दो सप्ताह के भीतर स्टेटस रिपोर्ट तलब कर ली है।

पूरा मामला साल 2010 का है, जब डॉ. सुमित सोफत की शिकायत पर थाना डिवीजन नंबर 5 की पुलिस ने लूट, अपहरण और हत्या के प्रयास जैसी संगीन धाराओं के तहत केस दर्ज किया था। आरोप है कि राजनीतिक संरक्षण के चलते पुलिस ने 2013 में इस केस को बंद करने के लिए कैंसिलेशन रिपोर्ट दाखिल कर दी, जिसे 2014 में कोर्ट ने खारिज करते हुए दोबारा जांच के आदेश दिए थे। लेकिन हैरानी की बात यह है कि साल 2014 से 2025 तक पुलिस कुंभकर्णी नींद सोई रही और जब मामला दोबारा गरमाया तो फरवरी 2026 में पुलिस ने कोर्ट में वही पुरानी रद्द की गई रिपोर्ट को ‘नई जांच’ बताकर पेश कर दिया।

कोर्ट ने जब फाइलों का मिलान किया तो पाया कि यह रिपोर्ट पुरानी रिपोर्ट की नकल थी, जिसमें पिछली कार्रवाई का कोई जिक्र तक नहीं था। अदालत में डॉ. सुमित सोफत ने पुलिसिया जांच की पोल खोलते हुए बताया कि आरोपी बेहद प्रभावशाली हैं। पहले वे कांग्रेस में रहकर जांच प्रभावित करते रहे और अब सत्ताधारी आम आदमी पार्टी का दामन थामकर पुलिस पर दबाव बना रहे हैं। आलम यह है कि 11 साल बीत जाने के बाद भी पुलिस ने न तो आरोपियों को गिरफ्तार किया और न ही वारदात में इस्तेमाल हथियार, क्लोरोफॉर्म, लूटी गई रोलेक्स घड़ी और स्कॉर्पियो गाड़ी बरामद की। कोर्ट ने पुलिस की इस हरकत पर सख्त टिप्पणी करते हुए रिपोर्ट वापस थाने भेज दी है और एसएचओ को नए सिरे से जांच के निर्देश दिए हैं। अब हाईकोर्ट की सख्ती के बाद महकमे में हड़कंप मच गया है और सबकी नजरें डीजीपी द्वारा पेश की जाने वाली रिपोर्ट पर टिकी हैं।

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