संसद में महिला आरक्षण का विधेयक गिरने के बाद मची गहमागहमी के बीच मोदी सरकार ने खामोशी के साथ एक बड़ा कूटनीतिक दांव चलते हुए वरिष्ठ बीजेपी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री दिनेश त्रिवेदी को बांग्लादेश का अगला उच्चायुक्त नियुक्त किया है. उनकी नियुक्ति कई मायनों में ऐतिहासिक और रणनीतिक मानी जा रही है. इसकी वजह ये है कि पड़ोस के देश में लंबे समय बाद उच्चायुक्त की नियुक्ति पाने वाले त्रिवेदी पहले राजनीतिक व्यक्ति होंगे. इससे पहले पड़ोसी देशों में यह पद भारतीय विदेश सेवा के अधिकारियों को ही दिया जाता रहा है. उनकी नियुक्ति एक बड़ा संदेश भी दे रही है, जिसे हम डिकोड करने जा रहे हैं.

कौन हैं दिनेश त्रिवेदी?

दिनेश त्रिवेदी पश्चिम बंगाल के बर्राकपुर से पूर्व सांसद हैं. उनकी राजनीतिक यात्रा कई दलों से जुड़ी रही है. वे कई दलों से जुड़े रहे हैं. कांग्रेस, जनता दल और तृणमूल कांग्रेस से जुड़े रहने के बाद वे 2021 में ममता बनर्जी का साथ छोड़कर बीजेपी से जुड़े. वे यूपीए सरकार में रेल मंत्री और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री के रूप में काम कर चुके हैं. उन्होंने सांस लेने में दिक्कत और राज्य में हिंसा-भ्रष्टाचार का हवाला देते हुए टीएमसी से इस्तीफा दिया था.

जानकारों के मुताबिक, दिनेश त्रिवेदी पश्चिम बंगाल के रहने वाले हैं और बांग्लादेश के मामलों को अच्छी तरह समझते हैं. वे बांग्लादेश के साथ सीमा प्रबंधन, अवैध घुसपैठ, व्यापार और सांस्कृतिक मुद्दों की बारीकी जानते हैं. रेल मंत्री रहते हुए वो बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स संभाल चुके हैं. ऐसे में बांग्लादेश के साथ संबंध मजबूत करने के लिए उनका यह अनुभव बहुत काम आने वाला है.

समझें उच्चायुक्त बनने के मायने 

जो लोग डिप्लोमेसी को जानते हैं, वे इस नियुक्ति को दूसरे अर्थों में देख रहे हैं. उनका मानना है कि यह नियुक्ति सामान्य नहीं है और दुनिया को दोहरा संदेश दे रही है. पहला, इस नियुक्ति के जरिए भारत-बांग्लादेश संबंधों को दोबारा पटरी पर लाने का संकेत दिया जा रहा है. शेख हसीना सरकार के पतन और मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के दौरान दोनों मुल्कों के संबंध तनावपूर्ण रहे थे.

हालांकि, फरवरी 2026 में BNP नेता तारिक रहमान की सरकार बनने के बाद दोनों देश अब सतर्कता के साथ संबंध सुधार रहा है. ऐसे में एक राजनेता की उच्चायुक्त के रूप में नियुक्ति भारत, ढाका को संकेत देना चाह रहा है कि नई दिल्ली उसके साथ गंभीरता से जुड़ाव बढ़ाना चाहता है.

मोदी सरकार दे रही ये बड़ा संकेत

दूसरा, कूटनीतिक नीति में बदलाव. असल में IFS अधिकारी सरकारी प्रोटोकॉल के तहत काम करते हैं और नियमों में रहकर ही काम करते हैं. वे आमतौर पर इसी दायरे से बंधे रहते हैं. जबकि राजनीतिक व्यक्ति ऐसे किसी दायरे में नहीं बंधा रहता और वह खुलकर हर तरह के समारोह-कार्यक्रमों में भाग लेता है और दोनों मुल्कों के संबंधों को आगे बढ़ाने की साहसिक पहल भी कर सकता है.

ऐसे में त्रिवेदी की नियुक्ति के जरिए मोदी सरकार संकेत दे रही है कि पड़ोसी देशों के महत्वपूर्ण पद अब केवल IFS अधिकारियों तक सीमित नहीं रहेंगे.

कितना कामयाब हो पाएगा कूटनीतिक दांव? 

माना जा रहा है कि बांग्लादेश में भारतीय उच्चायुक्त बनने के बाद दिनेश त्रिवेदी, दोनों मुल्कों में ट्रेड और रेल, सड़क कनेक्टिविटी बढ़ाने में अहम योगदान दे सकते हैं. वे बांग्लादेश में चीन के बढ़ते प्रभाव को काउंटर कर भारत की नेबरहुड फर्स्ट नीति को मजबूत कर सकते हैं.

ऐसे में दिनेश त्रिवेदी की नियुक्ति सामान्य कूटनीतिक बदलाव नहीं, बल्कि रणनीतिक पुनर्गठन भी हो सकता है. जानकारों का मानना है कि ऐसा करके मोदी सरकार यह दर्शा रही है कि वह पड़ोस में सक्रिय, अनुभवी और राजनीतिक रूप से मजबूत प्रतिनिधि भेजकर संबंधों को नई दिशा देना चाहती है. हालांकि, उसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इस पहल पर बांग्लादेश किस तरह सकारात्मक जवाब देता है.

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