वाराणसी, 08 अक्टूबर । केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने बुधवार को सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय परिसर स्थित सरस्वती भवन पुस्तकालय में संरक्षित दुर्लभ पांडुलिपियों का अवलोकन किया। उन्होंने राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के तहत चल रहे संरक्षण, डिजिटलीकरण एवं दस्तावेजीकरण के कार्यों की सराहना करते हुए इसे और अधिक गतिशील एवं प्रभावी बनाने के निर्देश दिए।

केन्द्रीय मंत्री शेखावत विश्वविद्यालय के 43वें दीक्षांत समारोह में भाग लेने के पश्चात अपरान्ह बाद पुस्तकालय पहुंचे। यहां उन्होंने संरक्षण प्रक्रिया का सूक्ष्म निरीक्षण किया और प्रत्येक तकनीकी पहलू की जानकारी ली। उन्होंने विशेष रूप से पांडुलिपियों के संरक्षण अनुरूपण यंत्र का निरीक्षण करते हुए ट्रीटमेंट प्रक्रिया को और तेज करने के निर्देश दिए।

उन्होंने कहा कि दुर्लभ पांडुलिपियां हमारे ज्ञान परंपरा की धरोहर हैं, जिनका संरक्षण न केवल सांस्कृतिक दायित्व है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए यह एक बहुमूल्य निधि भी है। गौरतलब है कि ज्ञान भारतम् (राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन) के अंतर्गत यहां पुस्तकालय में दुर्लभ पांडुलिपियों को संरक्षित, डिजिटाइज और दस्तावेजीकृत किया जा रहा है। इसका उद्देश्य न केवल इन्हें सुरक्षित रखना है, बल्कि इन्हें आम जन और शोधार्थियों के लिए ऑनलाइन उपलब्ध कराना भी है। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, मिशन का एक प्रमुख भागीदार है। विश्वविद्यालय के सरस्वती भवन पुस्तकालय में वर्तमान में 1.25 लाख से अधिक दुर्लभ पांडुलिपियों का संरक्षण किया जा रहा है। इसमें श्रीम‌द्भागवतम् (पुराण) संवत-1181 देश के प्राचीनतम कागज पर आधारित पांडु लिपी, भगवत्ता -स्वर्णाक्षरों में लिपी, दुर्गासप्तशती चित्रों के चित्र पर दो इंच की चौड़ाई वाली रील में अतिसूक्ष्म (संवत 1885 मग्नि पुरालेख ग्लास से देखा जा सकता है), रसपंचाध्यायी (सचित्र)-पुराणोतिहास विषय में सम्मिलित-देवनागरी लिपि (कृष्ण पुराण में वर्णित) निहित, कामवाचा (त्रिपिटक पर अंश), वर्मी लिपि- स्वर्ण समुद्र पर लाख पत्र, ऋग्वेद संहिता भाष्यम् इसके साथ ही लाह, भोजपत्र, वस्त्र काष्ठ सहित कागज पर लिपि लिपि पांडुलिपियां शामिल हैं। विभिन्न लिपियों में लिपिबद्ध हैं पांडुलिपियां इसके साथ ही ये पांडुलिपिया देवनागरी, खरोष्ठी, मैथिली, उड़िया, गुरुमुखी, तेलगु, कन्नड़ और संस्कृत की विभिन्न लिपियों में लिखी गई हैं।

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