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मुरादाबाद, 26 जनवरी खिली धूप, खुले परिसर और लगातार बढ़ती भीड़ के बीच उदीषा साहित्योत्सव का चौथा दिन मुरादाबाद के सांस्कृतिक जीवन का एक सशक्त और जीवंत चित्र बनकर सामने आया। सुबह से ही आयोजन स्थल पर लोगों की आवाजाही शुरू हो चुकी थी और जैसे-जैसे दिन आगे बढ़ा, यह स्पष्ट होता गया कि उदीषा अब केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि शहर की साझा सांस्कृतिक चेतना का उत्सव बन चुका है। दिन में लोक कलाओं की प्रस्तुति तो शाम को कव्वाली और कवि सम्मेलन ने समा बांधा।

सांस्कृतिक महोत्सव उदीषा : चौपाला साहित्योत्सव- 2026 के चौथे दिन मंचों पर चल रहे संवाद, सत्रों में भरे श्रोता और परिसर में फैली रचनात्मक हलचल यह संकेत दे रही थी कि साहित्य और संस्कृति यहाँ दर्शनीय नहीं, बल्कि अनुभव का विषय बन चुकी है।

दिन के प्रमुख सत्रों में प्रशासक और साहित्य पर हुआ संवाद विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। इस सत्र में संभल के जिलाधिकारी डॉ. राजेंद्र पैंसिया, लेखक आशुतोष गर्ग और सुचिता मलिक ने विचार रखे। आशुतोष गर्ग ने कहा कि साहित्यकार का काम समाज में बोध पैदा करना है, जबकि समाधान खोजने की जिम्मेदारी प्रशासन की होती है। सुचिता मलिक ने लेखन की लैंगिक पहचान पर बात करते हुए कहा कि रचना के समय लेखक केवल लेखक होता है—स्त्री या पुरुष नहीं।

टेंपल इकोनॉमिक्स विषय पर आयोजित संवाद ने दर्शकों का विशेष ध्यान आकर्षित किया। इस सत्र में ऋतुराज मिश्र और संदीप सिंह ने आस्था, पर्यटन, अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना के बीच सम्बंधों पर विचार रखे। सत्र के मॉडरेटर विवेक ठाकुर रहे।

अक्षत गुप्ता ने भारतीय दर्शन और समकालीन समाज के संदर्भ में गहन विचार रखे। उन्होंने कहा कि कलियुग में प्रत्येक मनुष्य के भीतर सुर और असुर-दोनों प्रवृत्तियाँ मौजूद रहती हैं और यह व्यक्ति की चेतना, संस्कार और चुनाव पर निर्भर करता है कि वह किस मार्ग को अपनाता है।

वहीं एआई और रचनात्मकता विषय पर आयोजित कार्यशाला में डॉ. प्रियंका सचदेवा ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मानवीय सृजन के सम्बंधों को सहज और व्यावहारिक ढंग से रखा।

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