पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के बीच अमेरिकी राष्टेरपति डोनाल्ड ट्रम्प का रवैया दुनिया के लिए समझ से बाहर होता जा रहा है। एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प लगातार यह बयान दे रहे हैं कि वह ईरान के साथ संघर्ष को खत्म करना चाहते हैं, लेकिन दूसरी तरफ जमीनी स्तर पर अमेरिका के कदम बिल्कुल उलट नजर आ रहे हैं।  अमेरिका ने ईरान के खिलाफ अपनी समुद्री कार्रवाई को और सख्त कर दिया है। United States Central Command (CENTCOM) के मुताबिक, अमेरिकी सेना इस समय ईरानी बंदरगाहों के आसपास कड़ी निगरानी रख रही है और जहाजों की आवाजाही को नियंत्रित कर रही है। इस कार्रवाई के तहत अब तक 38 जहाजों को वापस लौटने के लिए मजबूर किया गया है।

यह नाकेबंदी ऐसे समय में हो रही है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव चरम पर है। अमेरिकी सेना का कहना है कि यह कदम क्षेत्र में सुरक्षा बनाए रखने और गतिविधियों पर नियंत्रण रखने के लिए उठाया गया है। लेकिन इसका सीधा असर वैश्विक व्यापार और ऊर्जा सप्लाई पर पड़ रहा है। इस पूरी कार्रवाई का सबसे बड़ा असर  हॉर्मुज स्ट्रेट पर पड़ रहा है, जो दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है। यहां सख्ती बढ़ाने से न सिर्फ ईरान पर दबाव पड़ रहा है, बल्कि वैश्विक तेल और गैस सप्लाई भी प्रभावित हो रही है। इसका सीधा असर दुनिया भर में महंगाई और आर्थिक अस्थिरता के रूप में सामने आ रहा है। आलोचकों का कहना है कि अमेरिका एक तरफ शांति वार्ता की बात करता है, लेकि

इस बीच, ईरान कूटनीतिक स्तर पर सक्रिय है और उसने पाकिस्तान के जरिए अमेरिका को शांति प्रस्ताव भी भेजा है। लेकिन अमेरिका का सख्त रवैया इन प्रयासों को कमजोर कर सकता है। खासकर जब ट्रम्प पहले ही पाकिस्तान में होने वाली अहम वार्ता को रद्द कर चुके हैं। हालांकि, इसके बावजूद कुछ नई उम्मीदें सामने आ रही हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान ने अमेरिका को एक नया प्रस्ताव दिया है, जिसमें हॉर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने और युद्ध खत्म करने की बात कही गई है। इसके साथ ही ईरान ने सुझाव दिया है कि फिलहाल परमाणु वार्ता को टाल दिया जाए और पहले शांति और स्थिरता पर ध्यान दिया जाए। कुल मिलाकर, एक तरफ जहां अमेरिका की सख्त सैन्य कार्रवाई से दबाव बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ कूटनीतिक स्तर पर समाधान खोजने की कोशिशें भी जारी हैं। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि यह संकट और गहराएगा या किसी समझौते की ओर बढ़ेगा।न दूसरी तरफ ऐसे कदम उठाता है जो हालात को और बिगाड़ते हैं। इससे यह सवाल उठता है कि क्या अमेरिका वास्तव में शांति चाहता है या फिर वह दबाव की राजनीति के जरिए अपने हित साधना चाहता है।

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