मनोज पाल (9911711593)
मुज़फ्फरनगर | मुज़फ्फरनगर की पवित्र मिट्टी ने कई ऐसे व्यक्तित्वों को जन्म दिया है जिन्होंने अपने कर्म और करुणा से समाज में मिसाल कायम की। इन्हीं में से एक हैं मीनाक्षी महंत, जिनका जीवन त्याग, सेवा और इंसानियत की अद्भुत मिसाल है। मूल रूप से खालापार मुज़फ्फरनगर की रहने वाली मीना अंसारी आज पूरे किन्नर समाज में अपनी अलग पहचान बना चुकी हैं। बचपन से ही ईश्वर ने उन्हें दूसरों से अलग बनाया था और शायद इसी वजह से उन्होंने अपनी ज़िंदगी को दूसरों की सेवा के लिए समर्पित कर दिया।सिर्फ बारह वर्ष की उम्र में उन्होंने जीवन की एक नई राह पकड़ी। कालका स्थित डेरा में उनकी गुरु स्वीटी महंत ने उन्हें अपने सानिध्य में लिया और नया नाम दिया मीनाक्षी महंत। वहीं से उनके जीवन की असली यात्रा शुरू हुई। गुरु के मार्गदर्शन में उन्होंने सेवा, त्याग और आस्था को अपना जीवन मंत्र बना लिया। धीरे-धीरे वे गुरु की सबसे विश्वासपात्र शिष्या बनीं और अब स्वयं हिमाचल प्रदेश के रोडू क्षेत्र में अपने डेरे की संचालिका हैं जो शिमला से लगभग सौ किलोमीटर दूर है।
मीनाक्षी महंत का जीवन किन्नर समाज की पारंपरिक सीमाओं से बिल्कुल अलग है। वे सिर्फ बधाई देने नहीं जातीं बल्कि जहां जरूरत होती है वहां मदद के लिए खुद पहुंचती हैं। उन्होंने कई गरीब लड़कियों की शादी कराई, अनाथ बच्चों की शिक्षा का जिम्मा उठाया और असहाय परिवारों के लिए मसीहा बन गईं। उन्होंने करीब बीस साल पहले खोटखाई नामक स्थान पर शिव परिवार मंदिर का निर्माण कराया जिसकी मूर्तियां जयपुर से मंगाई गईं और लगभग पच्चीस लाख रुपये की लागत से यह भव्य मंदिर तैयार हुआ। यह मंदिर आज भी उनकी आस्था और सेवा की गवाही देता है।मीनाक्षी महंत केवल मंदिर निर्माण तक ही सीमित नहीं रहीं। वे मुज़फ्फरनगर के खालापार में स्थित एक मदरसे को भी आर्थिक सहायता देती हैं ताकि वहां के बच्चे अच्छी शिक्षा प्राप्त कर सकें। धर्म और जाति से ऊपर उठकर उन्होंने हमेशा यही कहा कि इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है।
लॉकडाउन के कठिन समय में जब हर कोई अपने घरों में बंद था तब मीनाक्षी महंत ने सैकड़ों गरीब परिवारों के घर-घर जाकर मदद पहुंचाई। उन्होंने करीब डेढ़ सौ परिवारों को राशन, दवाइयां और कंबल उपलब्ध कराए। बीमार और असहाय लोगों का इलाज कराया और सर्दियों में खुद कंबल वितरण किया। जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने अपने इन कार्यों की कोई तस्वीर क्यों नहीं रखी तो वे मुस्कुराकर बोलीं “मैं दिखावा नहीं करती, इस हाथ से दिया तो दूसरे हाथ को पता भी नहीं चलना चाहिए, सेवा अगर दिल से की जाए तो वही सच्ची पूजा है।करीब पंद्रह साल पहले रोडू में उन्होंने सुनीता नाम की एक महिला को अपनी मुंहबोली बहन बनाया जिनके पति पहले ही उन्हें छोड़ चुके थे। सुनीता की दोनों बेटियां मीना और शिल्पा की शादी मीनाक्षी ने खुद अपने हाथों से कराई और आज भी वे उनके परिवार की देखभाल करती हैं।
गुरु स्वीटी महंत के निधन के तीन वर्ष बाद भी मीनाक्षी आज भी उनके आदर्शों पर चल रही हैं। गुरु के पास करोड़ों की संपत्ति और लगभग पचहत्तर किलो सोना था मगर मीनाक्षी ने कभी लालच नहीं किया। वे सिर्फ इतना कहती हैं कि पैसा आता-जाता रहता है लेकिन नेकी हमेशा अमर रहती है।आज मीनाक्षी महंत कई गरीब परिवारों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी निभा रही हैं। जो भी उन्हें बधाई के रूप में धन या वस्तुएं मिलती हैं उनमें से अधिकतर हिस्सा वे जरूरतमंदों को दान कर देती हैं। वे मानती हैं कि किन्नर होना कोई अभिशाप नहीं बल्कि ईश्वर का दिया हुआ वरदान है। उनका कहना है ईश्वर लाखों में से एक को चुनता है ताकि वह दूसरों को आशीर्वाद दे सके। हमारे पास आशीर्वाद देने की शक्ति है और हमें उसका सही उपयोग करना चाहिए।
किन्नर समाज की वर्तमान स्थिति पर भी वे खुलकर अपनी राय रखती हैं। उनका कहना है कि आजकल कुछ लोग सर्जरी करवाकर झूठे किन्नर बन जाते हैं और लोगों से वसूली करते हैं जिससे असली किन्नर समाज की छवि धूमिल होती है। वे कहती हैं “हम आशीर्वाद देने वाले लोग हैं, डराने वाले नहीं। जो झूठा रूप बनाकर समाज को ठगता है, वह हमारे पूरे समाज को बदनाम करता है।”मीनाक्षी महंत का जीवन हमें यह सिखाता है कि इंसान का मूल्य उसके रूप में नहीं बल्कि उसके कर्म में होता है। उन्होंने अपनी अलग पहचान को बोझ नहीं बल्कि सेवा का अवसर बनाया है। उनका हर कदम यही कहता है कि भलाई करने वाला कभी अकेला नहीं होता क्योंकि दुआ देने वाले हाथ कभी खाली नहीं रहते।आज मीनाक्षी महंत न केवल किन्नर समाज के लिए बल्कि पूरे मानव समाज के लिए प्रेरणा हैं। उन्होंने साबित किया कि अगर दिल में दया और सेवा की भावना हो तो जीवन कितना भी कठिन क्यों न हो, उसे रोशन किया जा सकता है।उनकी ज़िंदगी इस सच्चाई की मिसाल है कि इंसान अगर चाहे तो अपनी तकदीर नहीं, दूसरों की ज़िंदगी भी बदल सकता है।
