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चित्रकूट, 20 मई । विश्व प्रसिद्ध पौराणिक तीर्थ उप्र के जनपद चित्रकूट में पुरुषोत्तम मास (अधिक मास) का विशेष महत्व है। वैदिक ज्योतिष और सनातन धर्म में इस मास को अत्यंत पवित्र एवं पुण्यदायी माना गया है। यह माह भगवान विष्णु को समर्पित होता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दौरान श्रद्धा, संयम और भक्ति के साथ किए गए जप, तप, दान, व्रत और पूजन का फल कई गुना बढ़ जाता है। चित्रकूट के प्रमुख मंदिरों, आश्रमों और देव गंगा मंदाकिनी के घाटों पर सुबह से श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिल रही है। दिगम्बर अखाड़ा के महंत दिव्य जीवन दास महाराज ने इसे आत्मशुद्धि, सेवा और प्रभु भक्ति का श्रेष्ठ अवसर बताया है।

चित्रकूट के प्रमुख संत एवं दिगम्बर अखाड़ा के महंत दिव्य जीवन दास महाराज बताते हैं कि हिंदू पंचांग चंद्र गणना पर आधारित है। जबकि सौर वर्ष और चंद्र वर्ष में लगभग 11 दिनों का अंतर रह जाता है। इसी अंतर को संतुलित करने के लिए लगभग 32 महीने 16 दिन बाद एक अतिरिक्त मास जोड़ा जाता है। यही अधिक मास आगे चलकर “पुरुषोत्तम मास” कहलाया। महंत ने बताया कि पुराणों के अनुसार पहले इस मास को “मलमास” कहा जाता था और इसे शुभ कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता था। तब भगवान विष्णु ने इसे अपना नाम “पुरुषोत्तम” प्रदान कर सर्वोच्च सम्मान दिया। तभी से यह मास भगवान विष्णु की विशेष आराधना का काल माना जाने लगा। भगवान श्रीकृष्ण ने भी इस मास प्रिय बताया है।

उन्होंने बताया कि धर्मग्रंथों में पुरुषोत्तम मास को मोक्षदायी, पाप-नाशक और पुण्यवर्धक बताया गया है। मान्यता है कि इस माह में किया गया दान अक्षय फल देता है। श्रीमद्भागवत, श्रीमदभगवद्गीता, श्रीरामचरितमानस और विष्णु सहस्रनाम पाठ विशेष फलदायी होता है। देव गंगा मंदाकिनी में स्नान और दीपदान से मानसिक शांति एवं आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त होती है। संयमित जीवन और सत्कर्मों से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। इस माह में प्रभु विष्णु की आराधना करें। प्रतिदिन प्रातः स्नान कर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करें। तुलसी दल अर्पित करना अत्यंत शुभ माना गया है। “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप मन को शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। गरीबों को अन्न, वस्त्र, जल, फल और गौसेवा का विशेष महत्व बताया गया है।

श्रीरामचरितमानस, सुंदरकांड, विष्णु पुराण और भगवद्गीता का पाठ लाभकारी माना गया है। सादा भोजन, संयमित दिनचर्या और सदाचार इस मास की मूल भावना मानी गयी है। श्री महाराज ने कहा कि मांस, मदिरा और नशे से दूर रहें। क्रोध, अपशब्द, झूठ और विवाद से बचें। तामसिक भोजन और नकारात्मक विचारों से दूरी रखें। विवाह, गृहप्रवेश और अन्य मांगलिक कार्य इस मास में नहीं किए जाएंगे। महंत दिव्य जीवन दास महाराज ने बताया कि धर्माचार्यों के अनुसार यदि व्यक्ति इस पवित्र माह में अधर्म, अपमान, नशा, क्रोध और असंयमित जीवन अपनाता है तो पुण्य क्षीण होता है और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त नहीं हो पाता। इसलिए इस मास में आचरण की शुद्धता को विशेष महत्व दिया गया है। चित्रकूट के भरत मंदिर, स्वामी मत्थगजेन्र मंदिर, कामतानाथ मंदिर, चर के सोमनाथ समेत सभी प्रमुख मंदिरों में कथा, भजन-कीर्तन, संकीर्तन और विशेष पूजन कार्यक्रमों की शुरुआत हो गई है। मंदाकिनी के रामघाट तट पर श्रद्धालु स्नान कर दीपदान और दान-पुण्य करते नजर आ रहे हैं।

महंत दिव्य जीवन दास महाराज का कहना है कि पुरुषोत्तम मास केवल धार्मिक अनुष्ठानों का पर्व नहीं, बल्कि आत्ममंथन, सेवा, संयम और प्रभु भक्ति का दुर्लभ अवसर है। धर्मनगरी चित्रकूट में इसकी शुरुआत के साथ पूरे वातावरण में भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार दिखाई दे रहा है। श्रद्धालु पूरे माह भगवान विष्णु की आराधना कर सुख, शांति और कल्याण की कामना करेंगे।

By editor

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