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रक्षा मंत्री इजराइल काट्ज ने इस प्रस्ताव को पेश करते हुए कहा कि आर्मी रेडियो का मूल उद्देश्य सेना के जवानों के लिए प्रसारण करना था, लेकिन समय के साथ यह मंच आम नागरिकों तक पहुंच गया और इस पर सेना और सैनिकों की आलोचना करने वाली सामग्री प्रसारित होने लगी। उन्होंने दावा किया कि स्टेशन को बंद करने का मकसद सेना की राजनीतिक निरपेक्षता बनाए रखना है।

प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने भी इस फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में सेना द्वारा संचालित रेडियो स्टेशन का आम जनता के लिए प्रसारण करना असामान्य है। उन्होंने तुलना करते हुए कहा कि ऐसा मॉडल उत्तर कोरिया जैसे कुछ देशों में ही देखने को मिलता है।

हालांकि, सरकार के इस कदम की तीखी आलोचना हो रही है। पत्रकार संगठनों, नागरिक अधिकार समूहों और लोकतंत्र समर्थकों का कहना है कि यह फैसला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कमजोर करता है। इजराइली पत्रकार संघ की प्रतिनिधि अनात सरागुस्ती ने आरोप लगाया कि सरकार आलोचनात्मक मीडिया को नियंत्रित करना चाहती है।

इस बीच, मूवमेंट फॉर क्वालिटी गवर्नमेंट नामक स्वतंत्र निगरानी संस्था ने इस निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। इजराइल डेमोक्रेसी इंस्टीट्यूट ने चेतावनी दी है कि आर्मी रेडियो को बंद करना देश के स्वतंत्र सार्वजनिक समाचार प्रसारण का बड़ा हिस्सा खत्म करने जैसा है और ऐसे फैसले पर संसद में व्यापक बहस जरूरी है।

आलोचकों का कहना है कि यह कदम सरकार की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत मीडिया और न्यायिक संस्थाओं पर नियंत्रण बढ़ाने की कोशिश की जा रही है, खासकर ऐसे समय में जब देश चुनावी वर्ष की ओर बढ़ रहा है।

By editor

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