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— कांच शिल्प भारत की भौगोलिक विशेष पहचान (जीआई टैग) प्राप्त

वाराणसी, 09 दिसंबर । उत्तर प्रदेश की धार्मिक व पाैराणिक नगरी काशी (वाराणसी) की धरती सदियों से कला, संस्कृति और विरासत की साक्षी रही है। इसी विरासत की अनमोल धरोहर – कांच के मनकों की कला काशी तमिल संगमम के चौथे संस्करण में नमोघाट पर आयोजित सांस्कृतिक प्रदर्शनी के स्टालों पर लोगों को आकर्षित कर रही है। इन स्टालों पर काशी के कारीगरों की मेहनत और कौशल न केवल जीवित दिख रही है, वरन यह कला नई चमक भी बिखेर रही है।

स्टाल नंबर 11 के स्वामी कलाकार बाबूलाल बताते हैं कि चेन्नई और तमिलनाडु के अन्य शहरों से आए मेहमान उनके कांच से बने खिलौनों और मनकों को देखकर मंत्रमुग्ध हो रहे हैं। वे न केवल इन्हें बनते हुए देखने में दिलचस्पी ले रहे हैं, बल्कि बड़ी संख्या में खरीद भी रहे हैं। उनके चेहरे की मुस्कान उनकी कला की सफलता की कहानी खुद बयां करती है। बाबूलाल कहते हैं कि यह कला धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही थी। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए इस मंच ने हमें इसे बचाए रखने की नई उम्मीद दी है। वे कहते हैं कि एक भारत-श्रेष्ठ भारत की यह पहल न केवल सांस्कृतिक सेतु बना रही है बल्कि उनके व्यापार को भी नई दिशा और गति दे रही है। पहले यह कला सीमित दायरे तक ही जानी जाती थी, लेकिन अब यह तमिलनाडु तक पहुंच रही है। इससे उन्हें अपने उत्पादों के लिए बड़ा बाजार मिलने की उम्मीद है।

– कांच के मनकों का ऐतिहासिक वैभव –

बताते चलेें कि, वाराणसी का कांच शिल्प भारत की भौगोलिक विशेष पहचान (जीआई टैग) प्राप्त कलाओं में से आता है। यह सिर्फ कांच को आकार देना नहीं बल्कि कारीगर की पीढ़ियों से मिली महारत और रचनात्मकता का सुंदर संगम है।

कॉरीगरों के अनुसार, कांच के मनके पिघले हुए कांच को ऊंचे तापमान पर ढालकर बनाए जाते हैं। लकड़ी के ईंधन से 600 से 750 डिग्री सेल्सियस तक गर्म पॉट फर्नेस में कांच पिघलाया जाता है। फिर इसे लोहे की छड़ पर लपेटकर मनचाहे आकार में ढाला जाता है। खोखले कांच के मोती मुंह से फूंकने की पारंपरिक तकनीक से बनाए जाते हैं। शिल्पकार खोखली धातु की नली में हवा भरकर कांच को खूबसूरत रूप देता है यह कला धैर्य, कौशल और अनुभव की परख मांगती है। आकार देने के बाद इन्हें धीरे-धीरे ठंडा किया जाता है ताकि मनके मजबूत बने रहें और टूटने की संभावना कम हो। अंत में चिकनाई और चमक लाने के लिए पॉलिशिंग की विभिन्न प्रक्रियाएँ अपनाई जाती हैं। यही बारीकियाँ इन्हें विश्वभर में लोकप्रिय बनाती हैं।

कांच के इन रंगीन खिलौनों और मनकों में काशी का इतिहास, कारीगरों की मेहनत और भारत की विविध संस्कृति झलकती है। संगमम में इन्हें मिल रहा प्यार इस बात का प्रमाण है कि भारतीय कला चाहे कितनी भी पुरानी हो, उसका आकर्षण सदाबहार है।

काशी के ये चमकते मोती एक संदेश देते हैं कला जिंदा है, परंपरा जिंदा है, और एक भारत-श्रेष्ठ भारत का सपना भी जिंदा है।

कारीगर बाबूलाल कहते है कि काशी तमिल संगमम ने एक बार फिर सिद्ध किया है कि परंपराएं केवल कला नहीं होतीं वे भावनाएं होती हैं जो लोगों को जोड़ती हैं। तमिलनाडु के लोग जब काशी की कांच कला को देखते हैं, उसे छूते हैं और अपने घर ले जाते हैं तो केवल एक वस्तु नहीं बल्कि दो संस्कृतियों के बीच का बंधन साथ ले जाते हैं।

By editor

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