सांस्कृतिक विरासत का केंद्र  है धोपाप,    भगवान श्रीराम ने पापों से मुक्ति के लिए किया था स्थान

भगवान श्रीराम ने रावण वध के बाद पापों से मुक्ति के लिए किया था स्नान

सुल्तानपुर, 31 मई (हि.स.)। गंगा दशहरा पुराणों के अनुसार दस दिवसीय महापर्व का यह स्थल सांस्कृतिक विरासत का केंद्र रहा है । धोपाप उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में गोमती नदी के तट पर स्थित एक धार्मिक तीर्थस्थल है। यह “धोपाप धाम” के नाम से भी जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि गंगा दशहरा के अवसर पर यहां स्नान करने से सभी पाप धुल जाते हैं, क्योंकि इस स्थान पर भगवान श्रीराम ने रावण वध के बाद पापों से मुक्ति के लिए स्नान किया था ।

लखनऊ-वाराणसी सड़क मार्ग पर स्थित लम्भुआ तहसील मुख्यालय से लगभग आठ किलोमीटर दूर यह स्थल प्राचीन काल में सांस्कृतिक विरासत का केंद्र रहा है। गोमती नदी के किनारे टीले पर मौजूद श्रीराम जानकी मंदिर इसका उदाहरण है। लगभग चार शताब्दी पहले ढेमा की रानी स्वरूप कुँवरि ने श्रीराम जानकी मंदिर का निर्माण कराया था। यह भी अनुमान है इस स्थान पर प्राचीन मंदिर था। जिसके ध्वंसावशेष पर रानी स्वरूप कुँवरि इसका निर्माण कराया था। भूतल से लगभग एक सौ फुट ऊंचे टीले पर मंदिर अत्यंत मनोहारी व प्राकृतिक संपदा से भरपूर स्थल पर स्थित है।

मंदिर में भगवान राम – माता जानकी – लक्ष्मण – भरत – शत्रुघ्न का भरा – पूरा दरबार मौजूद है। गजेटियर के मुताबिक इसके अलावा मंदिर में राधा कृष्ण की मूर्ति स्थापित की गई है। गर्भगृह के दरवाजे के दोनों तरफ हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित है। इसके अलावा मंदिर के चारों दिशाओं में बनी छोटी कोठरियों में भी अनेक देवी- देवताओं के विग्रह स्थापित किए गए हैं। उत्तर- पूर्व कोने पर बने कक्ष में शिव दरबार है । दुर्लभ पत्थर के शिवलिंग के अलावा गणेश की प्रतिमा स्थापित है। जबकि, दक्षिण पश्चिम कोने पर मां दुर्गा तथा चतुर्भुजी विष्णु जी की मूर्तियां स्थापित हैं। दक्षिण – पूर्व के कोने पर गणेश व नंदी पर सवार शिव पार्वती की प्रतिमा है। शिव का एक हाथ नंदी के सिर पर है, उसमें माला प्रदर्शित हो रही है।

प्रचण्ड धूप व गर्मी में भी इस मंदिर के भीतर मौसम का प्रभाव काफी कम रहता है। हवा के आवागमन के लिए बनी खिड़कियां हल्की हवा में भी राहत पहुँचाती हैं। इसके अलावा मन्दिर के भीतर – बाहर हुए प्लास्टर सरीखे लेप अभी भी काफी मजबूत दशा में हैं।

आचार्य पं रवि शंकर शुक्ल ने बताया कि गंगा दशहरा पुराणों के अनुसार दस दिवसीय महापर्व है। यह पर्व ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से प्रारंभ होकर ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष दशमी तिथि तक मनाया जाता है। इस वर्ष यह पर्व दिनांक 28 मई से प्रारंभ होकर पांच जून 2025 तक रहेगा। मान्यता है कि दस दिन के इस व्रत से मनुष्य के दस पाप नष्ट हो जाते हैं। दस पाप में तीन कायिक, चार वाचिक तथा तीन मानसिक शामिल हैं। धरती पर गंगावतरण बृष लग्न एवं हस्त नक्षत्र में हुआ है। इस वर्ष यह महापर्व पांच जून 2025 को प्रातः 4:45 से वृष लग्न है। स्नान के लिए यह अमृतकाल है। इससे अत्यंत पुण्य प्राप्त होगा।

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