आज की दुनिया विज्ञान और वैश्वीकरण की उजली आभा में नहाई हुई है, पर भीतर कहीं असंतुलन और असंतोष की रेखाएँ भी गहरी हो चली हैं। ऐसे समय में पंडित दीनदयाल उपाध्याय का ‘एकात्म मानववाद’ आशा की किरण बनकर मार्ग दिखाता है। यह दर्शन अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा है। दीनदयाल जी के शब्दों में- ‘भारतीय संस्कृति का मूल स्वरूप यह है कि वह जीवन को एक समग्र और एकीकृत इकाई के रूप में देखती है।’ इसी विचार की आधारभूमि पर उनका ‘एकात्म मानववाद’ खड़ा है, जिसका मर्म है कि मनुष्य केवल देह नहीं, बल्कि मन, बुद्धि और आत्मा की समग्र इकाई है।
आधुनिक संदर्भ में यह दृष्टि और भी प्रासंगिक हो जाती है, क्योंकि आज का समाज व्यक्ति की पहचान को केवल उपभोक्ता तक सीमित कर रहा है। पूँजीवाद और साम्यवाद दोनों अपने चरम रूपों में असफल साबित हुए- पहले ने असमानता और शोषण को जन्म दिया, तो दूसरे ने व्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचल दिया। परिणामस्वरूप उत्पादन और उपभोग की अंधी दौड़ ने मनुष्य की आत्मिक आवश्यकताओं को हाशिए पर धकेल दिया है। इसका सजीव उदाहरण भारत में तेजी से फैलती मॉल-संस्कृति और ई-कॉमर्स है, जिसने भौतिक उपभोग को तो बढ़ाया है, परंतु परिवारों में साथ बैठने का समय और आत्मिक संवाद घटा दिया है। उन्होंने इसी सच्चाई को रेखांकित करते हुए कहा था- ‘मानव स्वभाव में दोनों प्रवृत्तियाँ निहित हैं-एक ओर क्रोध और लोभ, तो दूसरी ओर प्रेम और त्याग।’ यही द्वंद्व हमें स्मरण कराता है कि विकास तभी सार्थक होगा जब भौतिक और आत्मिक आवश्यकताओं के बीच संतुलन कायम किया जाए।”
दीनदयाल उपाध्याय जी मानते थे कि भारत की अर्थव्यवस्था का स्वरूप न तो पश्चिमी पूँजीवाद की विषमता हो और न ही साम्यवाद की कठोरता, बल्कि अपनी संस्कृति और समाज की आवश्यकताओं से उपजा एक मौलिक मार्ग हो। उनका ‘स्वदेशी-सामाजिक-आर्थिक मॉडल’ इसी दृष्टि का प्रतिबिंब था—जहाँ स्वदेशी आत्मनिर्भरता की शक्ति गढ़ता है और सामाजिक संवेदना विकास की धारा को अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाती है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि ‘हमारी अर्थव्यवस्था का उद्देश्य मनुष्य और समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति होना चाहिए, न कि केवल मुनाफ़ा कमाना।’ आज जब वैश्वीकरण ने उपभोक्तावाद और असमानता को गहरा किया है, तब यह मॉडल और भी आवश्यक प्रतीत होता है।
यही कारण है कि आधुनिक राजनीति में समावेशी और संतुलित विकास की अवधारणा धीरे-धीरे नीति का केंद्रीय तत्व बनती जा रही है। किंतु केवल नीतिगत उपाय पर्याप्त नहीं हैं; इसके पीछे ऐसी वैचारिक राजनीतिक दृष्टि की भी आवश्यकता है जो व्यक्ति और समाज को विरोधी नहीं, बल्कि पूरक मानकर आगे बढ़ाए। दीनदयाल उपाध्याय जी का ‘एकात्म मानववाद’ इसी दृष्टि का प्रतिपादन करता है, जहाँ व्यक्ति की उन्नति समाज की प्रगति से अभिन्न रूप से जुड़ी है। इसी भाव को अटल बिहारी वाजपेयी ने भी प्रतिध्वनित किया था- ‘व्यक्ति को सशक्त बनाना राष्ट्र को सशक्त बनाना है।’ सशक्तिकरण तभी पूर्ण होता है जब राजनीति की निष्ठा, अर्थव्यवस्था के अवसर और समाज की समानता साथ चलें- यही ‘एकात्म मानववाद’ का मर्म है। इसका सुंदर उदाहरण उत्तर प्रदेश और बिहार की वे महिलाएँ हैं, जिन्होंने सूक्ष्म ऋण और कौशल प्रशिक्षण के सहारे आत्मनिर्भरता प्राप्त कर राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज के समन्वय को मूर्त रूप दिया।
वैश्विक परिदृश्य में जब आतंकवाद, सांस्कृतिक विखंडन और मूल्यहीनता जैसी चुनौतियाँ बढ़ रही हैं, तब इस दर्शन की प्रासंगिकता और भी गहरी हो जाती है। दीनदयाल जी ने कहा था—“स्वतंत्रता तभी सार्थक है जब वह हमारी संस्कृति की अभिव्यक्ति का माध्यम बने।” स्वतंत्रता केवल राजनीतिक या आर्थिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मसम्मान की रक्षा भी है। किसी भी राष्ट्र की स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी जब वह अपनी मौलिक पहचान और संस्कृति की रक्षा करते हुए विश्व समुदाय के साथ जुड़े। यह दृष्टि हमें सिखाती है कि पश्चिमी मॉडल का अंधानुकरण नहीं, बल्कि अपनी परंपराओं के अनुरूप आधुनिकता ही सच्चा मार्ग है। भारत योग, आयुर्वेद और समरसता जैसे मूल्यों को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत कर रहा है- यही वह उदाहरण है जब स्वतंत्रता केवल राजनीतिक अस्तित्व से आगे बढ़कर संस्कृति की सार्वभौमिक अभिव्यक्ति बन जाती है।
आज जब मानवता पर्यावरण संकट से जूझ रही है, तब दीनदयाल जी का चिंतन दीपशिखा बनकर दिशा दिखाता है। वे कहते हैं- ‘बीज की इकाई ही जड़, तना, शाखाएँ, पत्ते, फूल और फल के रूप में अभिव्यक्त होती है… फिर भी हम बीज के माध्यम से उनकी एकता को पहचानते हैं।’ यह हमें स्मरण कराता है कि प्रकृति और मानव जीवन की जड़ एक ही है। दिल्ली की धुँधली हवा चेताती है कि विकास तभी सच्चा है जब अर्थव्यवस्था के साथ पर्यावरण और समाज का सामंजस्य बने। इसी भाव को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने व्यक्त किया- ‘भारत की प्रगति मानवता के एक-छठे हिस्से की नियति है।’ यही कारण है कि दीनदयाल जी ने संतुलन व संयम को विकास की कसौटी माना। गंगा की स्वच्छता से लेकर वृक्षारोपण तक की पहलें बताती हैं कि प्रकृति की रक्षा वास्तव में मानवता की आत्मा की रक्षा है।
सामाजिक दृष्टि से भी यह दर्शन समयानुकूल है। दीनदयाल उपाध्याय जी का ‘अंत्योदय’ केवल अर्थनीति का सूत्र नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना का प्रकाश स्तंभ है- यानी विकास की गंगा तब तक पूर्ण नहीं मानी जाएगी जब तक उसकी धारा समाज के अंतिम तट तक न पहुँचे। उनका मत था कि गरीबी केवल भौतिक अभाव का नाम नहीं बल्कि शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के संतुलित विकास का अवरोध है। इसी दृष्टि से Multidimensional Poverty Index (MPI) भी गरीबी को आय की सीमित परिभाषा से आगे बढ़ाकर शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और गरिमा जैसे संकेतकों के माध्यम से मापता है। MPI जहाँ नीति-निर्माण के लिए वैज्ञानिक आँकड़े और तुलनात्मक आकलन प्रस्तुत करता है, वहीं ‘एकात्म मानववाद’ उसे नैतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आधार देकर और व्यापक बना देता है।
इस संगम से आधुनिक समय में ‘अंत्योदय’ की परिधि केवल अन्न और आश्रय तक सीमित नहीं रही बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, डिजिटल सुविधा और पर्यावरणीय सुरक्षा तक विस्तृत हो गई है। जब किसी अज्ञात स्वयंसेवी का हाथ किसी निर्धन बालक को अक्षरज्ञान देता है, या किसी गाँव की अंधेरी झोपड़ी में सौर-दीपक पहली बार जल उठता है, तब ‘अंत्योदय’ नीतिगत कार्यक्रम से आगे बढ़कर करुणा और कर्तव्य का जीवंत रूप बन जाता है। यही दृष्टि आधुनिक युग के समावेशी और सतत विकास की आत्मा है। अतः पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का ‘एकात्म मानववाद’ आज भी प्रगति का प्रदीप-सा प्रकाशमान और अपरिहार्य है; यह केवल भारत की सांस्कृतिक धरोहर नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के उत्थान का सार्वभौमिक सूत्र है।
(लेखिका, दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से पीएच.डी. हैं और सामाजिक कार्यों में सक्रिय हैं।)
