केरल की पिनाराई विजयन सरकार ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर अपने वर्षों पुराने स्टैंड को पूरी तरह पलट दिया है। कभी “संवैधानिक समानता” की दुहाई देने वाली लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) सरकार ने अब सुप्रीम कोर्ट में भगवान अयप्पा की सदियों पुरानी परंपराओं और भक्तों की आस्था का समर्थन करने का निर्णय लिया है।

कैबिनेट का बड़ा फैसला: आस्था को प्राथमिकता

शुक्रवार (13 मार्च) को हुई एक विशेष कैबिनेट बैठक में राज्य सरकार ने त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड (TDB) के उस प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी, जिसमें 50 साल से कम उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को बरकरार रखने की बात कही गई है। सरकार 14 मार्च की समय सीमा तक सुप्रीम कोर्ट में एक नया हलफनामा दाखिल करेगी। यह 2018 के उस रुख से बिल्कुल उलट है, जब सरकार ने पुलिस सुरक्षा में महिलाओं को मंदिर ले जाने की वकालत की थी।

SC की डेडलाइन के बीच नीति में बदलाव

सरकार 14 मार्च को सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई डेडलाइन तक एक हलफनामा (affidavit) दाखिल करेगी। इस हलफनामे में संवैधानिक और कानूनी पहलुओं से जुड़े सात खास सवालों के जवाब दिए जाएंगे—जिनमें से कोई भी सवाल सीधे तौर पर महिलाओं के प्रवेश को अनिवार्य नहीं बनाता है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है, जब 2018 के उस फैसले के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिकाओं (review petitions) पर सुनवाई शुरू होने वाली है, जिसमें सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी गई थी। इन याचिकाओं पर सुनवाई 7 अप्रैल से शुरू होगी और इसकी अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली तीन-न्यायाधीशों की पीठ करेगी।

CPI(M) का संतुलित रुख: नेतृत्व का कहना है-कोई पलटी नहीं मारी

CPI(M) के प्रदेश सचिव एम.वी. गोविंदन ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में साफ किया कि पार्टी अपने मूल रुख पर कायम है। उन्होंने सरकार को निर्देश दिया है कि वह कानूनी विशेषज्ञों और विद्वानों से सलाह-मशविरा करने के बाद, साथ ही भक्तों की भावनाओं का ध्यान रखते हुए, एक “उचित जवाब” तैयार करे। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि सुप्रीम कोर्ट के सवाल व्यापक संवैधानिक मुद्दों पर केंद्रित हैं, जो सभी धर्मों को प्रभावित करते हैं, ये सवाल मंदिर में प्रवेश को लेकर सिर्फ ‘हां’ या ‘नहीं’ के बाइनरी जवाब तक सीमित नहीं हैं। उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि आस्था और अधिकारों के बीच संतुलन बनाने के लिए चर्चाएं ज़रूरी हैं। गोविंदन ने किसी भी तरह के वैचारिक बदलाव से इनकार किया और पार्टी के उस इतिहास का हवाला दिया, जिसके तहत पार्टी हमेशा से विशेषज्ञों की राय के आधार पर रीति-रिवाजों का सम्मान करती आई है।

देवस्वम बोर्ड की बात का समर्थन और चुनावी समीकरण

मंदिर के प्रबंधन की ज़िम्मेदारी संभालने वाले TDB ने 2 मार्च को एक प्रस्ताव पारित किया था। इस प्रस्ताव में बोर्ड ने अदालत में यह बात दोहराने का फैसला किया कि उसने कभी भी आधिकारिक तौर पर कम उम्र की महिलाओं के मंदिर में प्रवेश का समर्थन नहीं किया था। बोर्ड ने 2020 में एक वकील द्वारा व्यक्त की गई राय को उनकी निजी राय बताया और इस बात को फिर से दोहराया कि सदियों से चली आ रही रीति-रिवाजों की रक्षा करना उसका कर्तव्य है।

 

LDF और CPI(M) सचिवालय की मंज़ूरी से सरकार का यह बदलाव, विधानसभा चुनावों के समय के हिसाब से किया गया लगता है, ताकि इस मुद्दे का कांग्रेस और BJP द्वारा संभावित फ़ायदा उठाने के बीच, परंपरावादियों को नाराज़ होने से बचाया जा सके। 2018 का फ़ैसला इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन की 2006 की एक याचिका पर आधारित था, जिसने केरल हाई कोर्ट के 1991 के प्रतिबंध को पलट दिया था; लेकिन इसने विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया, जिसे LDF ने उस समय एक संवैधानिक जीत के तौर पर सही ठहराया था।

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