सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में धर्मांतरण रैकेट चलाने के आरोपी मौलवी मौलाना कलीम सिद्दिकी की उस याचिका पर विचार करने से गुरुवार को इनकार कर दिया। इस याचिका में उन्होंने अपने भतीजे की बरसी के लिए राज्य में प्रवेश की अनुमति मांगी थी।

न्यायमूर्ति एस.सी. शर्मा की अध्यक्षता वाली अवकाश पीठ ने कहा, “मौत पिछले साल हुई। परिवार में और सदस्य भी हैं। आपको तारीख के बारे में पहले से पता था। आप (सुप्रीम कोर्ट की) इसी पीठ के समक्ष पहले भी आवेदन कर सकते थे कि आपको फलां-फलां तारीख को जाना है। आवेदन (सुनवाई के लिए) अब आ रहा है जब रस्में पूरी हो चुकी हैं।” पीठ में न्यायमूर्ति पी.वी. वराले भी शामिल थे।
अवकाश पीठ इस बात से अप्रभावित दिखी कि परिवार के सबसे बुजुर्ग सदस्य सिद्दीकी पिछले साल भतीजे के जनाजे में शामिल नहीं हुए थे। याचिका पर सुनवाई की अदालत की अनिच्छा को देखते हुए सिद्दीकी के अधिवक्ता ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी। इस पर शीर्ष अदालत ने इसकी अनुमति देते हुए मामले को खारिज कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल अगस्त में सिद्दीकी को उनके भाई के जनाजे में शामिल होने के लिए उत्तर प्रदेश के उनके पैतृक गांव में जाने की अनुमति दे दी थी। शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में कहा था कि मौलवी अपने भाई की अंतिम क्रिया के अलावा किसी राजनीतिक या सामाजिक कार्यक्रम में शामिल नहीं होंगे और वह कोई सार्वजनिक भाषण नहीं करेंगे।

सिद्दीकी को दी गई जमानत की शर्तों में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अदालती सुनवाई के अलावा किसी और उद्देश्य से उनके उत्तर प्रदेश की सीमा में प्रवेश पर रोक लगा दी है। पिछले साल अप्रैल में उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अताउर रहमान मसूदी और सरोज यादव की खंडपीठ ने सिद्दीकी को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया था। उन्हें 100 से ज्यादा लोगों के धर्मांतरण के आरोप में मेरठ से गिरफ्तार किया गया था।
उच्च न्यायालय ने इस आधार पर उनकी जमानत मंजूर की थी कि सुप्रीम कोर्ट ने मामले में सह अभियुक्त को जमानत दे दी थी। यूपी एटीएस ने दावा किया था कि वह देश में सबसे बड़ा धर्मांतरण सिंडिकेट चला रहे थे और उनके ट्रस्ट को हवाला के जरिये पैसा मिल रहा था।

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