प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उत्तर प्रदेश को असीमित क्षमताओं वाला प्रदेश करार देते हुए बुधवार को कहा कि कभी पिछड़ा और ‘बीमारू’ कहा जाने वाला यह राज्य अब एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने जैसे बड़े लक्ष्य की प्राप्ति की दिशा में पूरी तैयारी के साथ आगे बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री ने हरदोई के मल्लावां में 594 किलोमीटर लम्बे गंगा एक्सप्रेसवे का लोकार्पण करने के बाद अपने सम्बोधन में उत्तर प्रदेश के विकास का जिक्र करते हुए कहा कि पिछली सरकारों के कार्यकाल में हरदोई से भी किसी एक्सप्रेसवे के गुजरने की कल्पना नहीं की जा सकती थी लेकिन यह काम सिर्फ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार में ही सम्भव हुआ है।

उन्होंने कहा, ”पहले उत्तर प्रदेश को पिछड़ा और बीमारू प्रदेश कहा जाता था लेकिन आज यह प्रदेश एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यह बहुत बड़ा लक्ष्य है लेकिन इसके पीछे उतनी ही बड़ी तैयारी भी है क्योंकि उत्तर प्रदेश के पास असीम क्षमता है। देश की इतनी बड़ी युवा आबादी की क्षमता उत्तर प्रदेश के साथ है। इसका इस्तेमाल हम उत्तर प्रदेश को मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने के लिए कर रहे हैं।”

प्रधानमंत्री ने कहा, ”उत्तर प्रदेश ने पुरानी सियासत को भी बदला है और नई पहचान भी बनाई है।” मोदी ने कहा कि उत्तर प्रदेश में निवेश आयेगा तो नए उद्योग और कारखाने लगेंगे और तब आर्थिक प्रगति के दरवाजे खुलने से युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा होंगे, इसी विजन को केंद्र में रखकर बीते वर्षों में लगातार काम हुआ है। उन्होंने कहा, ”आप सब खुद भी महसूस कर रहे हैं कि जिस उत्तर प्रदेश की पहचान पहले पलायन से होती थी, आज उसे इन्वेस्टर्स समिट और इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के लिए जाना जा रहा है। आज अगर भारत दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन निर्माता है तो उसमें उत्तर प्रदेश की बहुत बड़ी भूमिका है।

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यह चुनाव केवल इस बात तक सीमित नहीं रह गया है कि राज्य सचिवालय नबान्न तक कौन पहुंचेगा, बल्कि यह इस बात पर जनमत संग्रह बन गया है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी 15 वर्षों के शासन के बाद भी बंगाल की केंद्रीय राजनीतिक शक्ति बनी रहती हैं या नहीं, और क्या लगातार चौथी जीत उन्हें 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले भाजपा के खिलाफ सबसे मजबूत विपक्षी चेहरा स्थापित कर सकती है, या फिर भाजपा को राज्य में सत्ता का रास्ता मिल गया। दो चरणों में हुए विधानसभा चुनाव में कुल मतदान 92.47 प्रतिशत दर्ज किया गया। पहले चरण में 93.13 प्रतिशत और दूसरे में 91.66 प्रतिशत मतदान हुआ। यह स्वतंत्रता के बाद का अब तक का सर्वाधिक मतदान है। इसने 2011 के 84 प्रतिशत मतदान के रिकॉर्ड को भी पार कर लिया, जब बनर्जी पहली बार सत्ता में आई थीं और 34 वर्षों के वाम मोर्चा शासन का अंत हुआ था। बनर्जी के लिए यह चुनाव उनके राजनीतिक जीवन की निर्णायक लड़ाई माना जा रहा है। लगातार तीन कार्यकाल और डेढ़ दशक तक सत्ता में रहने के बाद वह न केवल सत्ता बरकरार रखने बल्कि अपने स्थापित राजनीतिक ढांचे की रक्षा के लिए भी संघर्ष कर रही हैं। तृणमूल कांग्रेस और बनर्जी के बीच अंतर लगभग समाप्त हो चुका है। 2021 में हुए विधानसभा चुनाव में जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा ने आक्रामक अभियान चलाया था, तब बनर्जी ने चोटिल होने के बावजूद व्हीलचेयर पर रहकर मुकाबला किया और जीतीं, जिससे उनका कद राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत विपक्षी नेता के रूप में बढ़ा। 2026 की लड़ाई अधिक कठिन मानी जा रही है। इस बार उन्हें सत्ता विरोधी लहर, भ्रष्टाचार के आरोप, भर्ती घोटालों और शासन संबंधी सवालों का सामना करना पड़ रहा है। तृणमूल के एक वरिष्ठ मंत्री ने कहा, “यह चुनाव बंगाल की राजनीतिक पहचान की रक्षा को लेकर है। यदि दीदी फिर जीतती हैं, तो यह साबित होगा कि कल्याणकारी राजनीति और बंगाली अस्मिता सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को हरा सकती है।” दूसरी ओर, भाजपा के लिए बंगाल अब भी अधूरा राजनीतिक लक्ष्य बना हुआ है। पार्टी का मानना है कि वह राज्य में सत्ता हासिल कर अपने “अंतिम वैचारिक मोर्चे” को पार कर सकती है। पार्टी का वोट शेयर 2011 में लगभग चार प्रतिशत से बढ़कर 2019 में करीब 40 प्रतिशत तक पहुंचा और 2021 में उसने 77 सीटें जीतीं, जिससे वह तृणमूल की मुख्य प्रतिद्वंद्वी बन गई। एक भाजपा नेता ने कहा, “हमारे लिए बंगाल अधूरा राजनीतिक मिशन है। श्यामा प्रसाद मुखर्जी से लेकर आज तक यह एक राजनीतिक यात्रा को पूरा करने का प्रश्न है।” चुनाव में सबसे बड़ा विवाद मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर रहा। राज्यभर में लगभग 91 लाख नाम हटाए जाने से करीब 12 प्रतिशत मतदाता सूची से बाहर हो गए। तृणमूल ने इसे अल्पसंख्यकों, प्रवासियों, महिलाओं और गरीबों के मताधिकार को प्रभावित करने वाला कदम बताया, जबकि भाजपा ने इसे फर्जी नामों को हटाने की प्रक्रिया बताया। विश्लेषकों का मानना है कि एसआईआर ने चुनाव के गणित के साथ-साथ मनोविज्ञान को भी प्रभावित किया है। राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती ने कहा कि चुनाव केवल संख्याओं से नहीं, बल्कि उससे उत्पन्न मनोवैज्ञानिक प्रभाव से तय होते हैं। मतगणना चार मई को होगी, जब यह स्पष्ट हो जाएगा कि बनर्जी का लंबे समय से चला आ रहा राजनीतिक वर्चस्व बरकरार रहता है या भाजपा अंततः राज्य में सत्ता तक पहुंचने में सफल होती है।

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