जानसठ। कस्बे में एक बार फिर मेले के आयोजन को लेकर सरगर्मियां तेज हो गई हैं। आयोजक अनुमति के लिए प्रशासनिक अधिकारियों की चौखट पर चक्कर काट रहे हैं, लेकिन स्थानीय नागरिकों और सुरक्षा के लिहाज से यह ‘मनोरंजन’ भारी चिंता का विषय बना हुआ है। पिछले वर्ष के कड़वे अनुभवों को देखते हुए सवाल उठ रहा है कि क्या प्रशासन फिर से कस्बे की बहू-बेटियों की सुरक्षा को दांव पर लगाने को तैयार है?
पिछला साल: जब मर्यादा की सारी हदें पार हो गईं
गौरतलब है कि बीते वर्ष खतौली मार्ग पर आयोजित मेले में अव्यवस्थाओं का अंबार था। मेले में न केवल आम युवतियों के साथ छेड़छाड़ की घटनाएं हुईं, बल्कि हद तो तब हो गई जब सिविल ड्रेस में एक महिला कांस्टेबल के साथ भी बदसलूकी का मामला सामने आया। इस घटना ने पुलिस प्रशासन और सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी थी। इसी गंभीर स्थिति को देखते हुए तत्कालीन प्रशासन ने आनन-फानन में मेले पर रोक लगा दी थी।
स्थानीय लोगों का कहना है कि मेले के नाम पर बाहरी तत्वों और मनचलों का जमावड़ा लग जाता है। अंधेरा ढलते ही खतौली मार्ग अराजकता का केंद्र बन जाता है। महिलाओं का मेले में जाना तो दूर, उस मार्ग से गुजरना भी दूभर हो जाता है। ऐसे में आयोजकों द्वारा दोबारा अनुमति मांगना स्थानीय शांति को खतरे में डालने जैसा है।
प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती —
प्रशासनिक अधिकारियों के लिए यह निर्णय किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। एक तरफ आयोजकों का दबाव है, तो दूसरी तरफ जनता की सुरक्षा और पिछले वर्ष का दाग। बड़ा सवाल यह भी है जब महिला पुलिसकर्मी ही सुरक्षित नहीं थी, तो आम महिलाओं की सुरक्षा की गारंटी कौन लेगा? क्या चंद दिनों के आयोजन के लिए कस्बे की कानून-व्यवस्था से खिलवाड़ करना उचित है? कस्बे के प्रबुद्ध नागरिकों ने स्थानीय प्रशासन से पुरजोर मांग की है कि पिछले वर्ष की घटनाओं को संज्ञान में लेते हुए इस वर्ष मेले की अनुमति न दी जाए। यदि अनुमति दी भी जाती है, तो आयोजकों की जवाबदेही तय हो ।
सी ओ रूपाली राय चौधरी का कहना है कि — पुरानी परम्परा को रोका जाना सम्भव नहीं है सुरक्षा दृष्टी को लेकर फोर्स बढ़ाई जाएगी।