अगर आपके मोबाइल की किसी वॉट्सऐप चैट या फोटो के आधार पर आपको 22 करोड़ रुपए का टैक्स नोटिस मिल जाए, तो? ऐसा ही एक हैरान करने वाला मामला दिल्ली के एक शख्स कुमार के साथ हुआ। आयकर विभाग ने कुमार को 22 करोड़ रुपए के “अनएक्सप्लेंड इन्वेस्टमेंट” यानी अघोषित निवेश का नोटिस भेज दिया। विभाग का आधार था- एक तीसरे व्यक्ति के मोबाइल में मिली वॉट्सऐप चैट और कुछ लिफाफों की तस्वीरें।

कैसे शुरू हुआ मामला

द इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, मामला तब सामने आया जब आयकर विभाग ने एक रियल एस्टेट कंपनी पर छापा मारा। जांच के दौरान एक व्यक्ति प्रवीण जैन के मोबाइल से कुछ फोटो और वॉट्सऐप चैट बरामद हुईं। इन चैट्स में कुछ लिफाफों की तस्वीरें थीं, जिन पर अलग-अलग लोगों के नाम लिखे थे। विभाग का दावा था कि इन लिफाफों में नकद या चेक रखे गए थे, जो निवेश पर रिटर्न देने के लिए इस्तेमाल होते थे। इन्हीं में से एक लिफाफे पर “कुमार” नाम लिखा मिला। विभाग ने मान लिया कि यह वही कुमार हैं और उन्होंने किसी कंपनी में 22 करोड़ रुपये का निवेश किया है।

विभाग ने लगाया 22 करोड़ का टैक्स

विभाग ने आयकर अधिनियम की धारा 153C और 69 के तहत कार्रवाई करते हुए कुमार पर 22,50,75,000 का अनएक्सप्लेंड इन्वेस्टमेंट और 22,50,750 का अनएक्सप्लेंड मनी का आरोप लगाया। आयकर अधिकारी (AO) ने दावा किया कि कुमार को इस निवेश पर ब्याज भी मिला था। हालांकि, विभाग यह नहीं बता सका कि निवेश कब, कैसे और कहां हुआ। ब्याज की राशि देखकर “उलटे हिसाब” से 22 करोड़ का अनुमान लगाया गया।

मेरे खिलाफ कोई सबूत नहीं

हालांकि, कुमार ने सभी आरोपों से साफ इनकार किया। उनका कहना था कि न तो उनका किसी रियल एस्टेट कंपनी से कोई संबंध है, न ही प्रवीण जैन नाम के व्यक्ति से कोई लेनदेन। उन्होंने कहा कि वॉट्सऐप चैट किसी तीसरे व्यक्ति के फोन से मिली थी, और न तो वह चैट उनके नाम पर थी, न ही किसी प्रमाणित दस्तावेज से जुड़ी थी। इसके बावजूद AO ने उनकी आपत्ति खारिज कर दी और टैक्स ऑर्डर जारी कर दिया। CIT (Appeals) ने भी उन्हें राहत नहीं दी।

ITAT दिल्ली ने पलटा पूरा केस

अंत में कुमार ने मामला आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT), दिल्ली में ले जाया। यहां से उन्हें बड़ी राहत मिली। ITAT ने कहा कि सिर्फ वॉट्सऐप चैट या तीसरे व्यक्ति के मोबाइल डेटा के आधार पर किसी करदाता के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जा सकती। ट्रिब्यूनल ने पाया कि किसी भी लिफाफे या दस्तावेज पर कुमार का नाम स्पष्ट रूप से नहीं था, ब्याज की गणना वाली शीट अप्रमाणित और बिना हस्ताक्षर की थी, न कोई लोन एग्रीमेंट, न रसीद, न भुगतान का कोई सबूत पेश किया गया। यहां तक कि जैन और उसके बेटे के बयानों में भी कुमार का नाम नहीं आया।

ITAT ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा, “धारा 153C के तहत कार्रवाई तभी हो सकती है जब किसी छापे के दौरान कोई ठोस, अपराध-सिद्ध करने वाला सबूत मिले।” इस मामले में ऐसा कोई प्रमाण मौजूद नहीं था। ट्रिब्यूनल ने यह भी रेखांकित किया कि जिस रियल एस्टेट कंपनी पर छापा पड़ा था, वहां भी कोई टैक्स ऐडिशन नहीं किया गया था। अंतिम फैसला सुनाते हुए ITAT दिल्ली ने आयकर विभाग के सभी दावे खारिज करते हुए कुमार के पक्ष में फैसला सुनाया। 22 करोड़ रुपये की टैक्स डिमांड को पूरी तरह रद्द कर दिया गया और विभाग की कार्रवाई को “बिना सबूत की कहानी” बताया।

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