बांग्लादेश की सत्ताधारी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने शनिवार (16 मई) को ढाका और नई दिल्ली के बीच संबंधों के भविष्य को अब गंगा जल बंटवारे संधि के नवीनीकरण से जोड़ दिया है. बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के कार्यकाल के दौरान 1996 में हस्ताक्षरित मौजूदा भारत-बांग्लादेश गंगा जल बंटवारा संधि इस साल दिसंबर में समाप्त होने वाली है.

ढाका में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए बीएनपी के महासचिव और ग्रामीण विकास सहकारिता मंत्री मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने कहा कि बांग्लादेश भारत को एक स्पष्ट संदेश देना चाहता है कि बांग्लादेशी लोगों के हितों के अनुरूप बातचीत के जरिए नए समझौते को अंतिम रूप दिया जाना चाहिए.

क्या बोले मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर?

आलमगीर ने कहा कि भारत के साथ अच्छे संबंध स्थापित करने का अवसर गंगा जल बंटवारा संधि या फरक्का समझौते पर हस्ताक्षर होने पर निर्भर करेगा. उन्होंने यह भी तर्क दिया कि नए समझौते पर हस्ताक्षर होने तक मौजूदा समझौता लागू रहना चाहिए और सुझाव दिया कि दोनों पड़ोसी देशों के बीच भविष्य के जल बंटवारे के समझौते एक निश्चित अवधि तक सीमित नहीं होने चाहिए.

सैंकड़ों नदियों से घिरा है बांग्लादेश 

बता दें कि चपाई नवाबगंज जिले से बांग्लादेश में प्रवेश करने के बाद गंगा नदी पद्मा के नाम से जानी जाती है. इस नदी के पानी से ही बांग्लादेश के निचले इलाकों में कृषि होती है. जैव विविधता और जल आपूर्ति प्रणालियों के लिए भी गंगा नदी काफी महत्वपूर्ण है.

सैंकड़ों नदियों से घिरे बांग्लादेश में 54 नदियां या तो भारत से निकलती हैं या फिर भारत से होकर ही बहती हैं. आलमगीर के अनुसार बांग्लादेश की 17 करोड़ आबादी का लगभग एक तिहाई हिस्सा आजीविका के लिए इसी नदी पर निर्भर है.

क्या है फरक्का विवाद?

बांग्लादेश में फरक्का का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक और भावनात्मक रूप से संवेदनशील रहा है. देश की सरकारों और जल विशेषज्ञों का तर्क रहा है कि फरक्का बैराज के कारण शुष्क मौसम में नदी के निचले इलाकों में जल प्रवाह कम होने से खारे पानी आने लगता है और नदी प्रणालियों को नुकसान पहुंचता है. वहीं भारत लगातार यह कहता रहा है कि फरक्का बैराज का निर्माण मुख्य रूप से हुगली नदी में पानी मोड़कर गाद को बहाने और कोलकाता बंदरगाह को दुरुस्त रखने के लिए किया गया था.

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