उदय कुमार सिंह

हम सभी भारतीयों के जीवन में गणेशोत्सव का गहरा महत्व है। गणेश उत्सव के दस दिनों में घर-घर में गणपति बप्पा की स्थापना होती है और भक्तजन पूरे मन से उनकी पूजा-उपासना करते हैं। पहले दिन गणपति की स्थापना और आखिरी दिन विसर्जन की परंपरा इस त्योहार को विशेष बनाती है। इस वर्ष गणेशोत्सव 27 अगस्त से शुरू होगा और 6 सितंबर को समाप्त होगा। गणेश चतुर्थी 27 अगस्त को मनाई जाएगी। इस दिन भगवान गणेश की स्थापना की जाएगी। यह त्यौहार 10 दिनों तक चलता है, जिसमें अनंत चतुर्दशी पर गणेश विसर्जन किया जाता है।

भगवान श्री गणेश का देवताओं में असाधारण महत्व है। हमारे शरीर में पांच ज्ञानेन्द्रियां, पांच कर्मेन्द्रियां एवं चार अंतःकरण हैं। इनके पीछे जो शक्तियां हैं, उनको चौदह देवता कहते हैं। इन देवताओं के मूल प्रेरक भगवान गणेश ही हैं। भगवान गणेश शब्द ओंकार के प्रतीक हैं। भगवान गणेश विघ्नहर्ता हैं। अतः इनकी उपासना से समस्त कार्य निर्विघ्न रूप से पूर्ण हो जाते हैं। भगवान गणेश उमा-महेश्वर के पुत्र हैं। वे गणों के ईश हैं। स्वास्तिक रूप हैं। इनके अनंत नाम हैं। इनकी उपासना से विद्या, विवाह, संतान, धन, सिद्धि, आनंद एवं प्रसन्नता की प्राप्ति होती है।

भगवान गणेश पूजा के लिए बुधवार का दिन सर्वश्रेष्ठ माना गया है। गणेश जी बुद्धि के देवता माने गये हैं। अतः बुधवार को इनकी पूजा का विशेष महत्व है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार बुध ग्रह गणेश जी को ऋद्धि-सिद्धि तथा बुद्धि प्रदान करने वाले हैं। इसलिए इनकी आराधाना से भक्तों के घर में गणेश जी अपनी पत्नियों ऋद्धि-सिद्धि एवं पुत्र शुभ-लाभ सहित निवास करते हैं।

बुद्धि और सफलता के लिए बुधवार का दिन देव उपासना के लिए भी श्रेष्ठ है, क्योंकि यह दिन बुद्धिदाता भगवान गणेश के अतिरिक्त बुध देव की उपासना के लिए भी विशेष दिन माना गया है।

धार्मिक दृष्टि से बुध देव बुद्धि एवं समृद्धि देने वाले माने गए हैं। बुध ग्रह का शुभ प्रभाव कारोबार में सफलता, विद्या, एकाग्रता एवं अच्छी याददाश्त देने के साथ-साथ अनावश्यक तनावों से मुक्ति प्रदान करता है। बुधवार के दिन बुध देव की उपासना से बुध ग्रह के सभी बुरे प्रभाव नष्ट हो जाते हैं तथा उपासकों को मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है।

मानव जीवन में गणेश चतुर्थी की महत्ता

भारत वर्ष में गणेश चतुर्थी व्रत मनाने की परंपरा अति प्राचीन है। परंतु महाराष्ट्र में इस पर्व को अधिक महत्व एवं हर्षोल्लास से मनाया जाना, वहां के राजाओं की देन है। इतिहासकारों के अनुसार महाराष्ट्र में सबसे पहले मराठा साम्राज्य के महानायक छत्रपति शिवाजी महाराज के शासन काल यानी सन् 1627 (सोलह सौ सत्ताईस) से 1680 (सोलह सौ अस्सी) तक गणेश पूजा को अधिक महत्व दिया गया। इसके उपरांत बाजीराव पेशवा के नेतृत्व में संपूर्ण महाराष्ट्र प्रांत में पेशवा का साम्राज्य स्थापित हो गया। कहा जाता है कि श्री गणेश बाजीराव पेशवा के इष्ट देव थे। पेशवा साम्राज्य में सन् 1815 (अट्ठारह सौ पंद्रह) में आखिरी बार गणेशोत्सव को हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।

पेशवा राज्य के पतन के पश्चात 1818 (अट्ठारह सौ अट्ठारह) से 1892 (अट्ठारह सौ बानवे) तक गणेशोत्सव केवल महाराष्ट्र के परिवारों तक ही सीमित कर दिया गया। किंतु भगवान गणेश की सार्वजनिक पूजा की शुरूआत 1893 (अट्ठारह सौ तिरानवे) में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने पुणे में की। उन्होंने गणेशोत्सव पर्व के माध्यम से विभिन्न प्रांतों, जातियों, भाषाओं एवं संस्कृतियों को एकता में पिरोने का प्रयास किया। बाल गंगाधर तिलक अपने उद्देश्य में काफी हद तक सफल रहे। उन्होंने गणेशोत्सव को स्वाधीनता की पहचान बना दिया। उस समय से ही न केवल महाराष्ट्र, अपितु देश के अन्य प्रांतों में भी गणेश जी की भव्य प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं।

वर्तमान में न केवल महाराष्ट्र, अपितु अन्य प्रांतों में भी गणेशोत्सव भक्ति-भाव एवं हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। गणेशोत्सव के अवसर पर भारतीय कला एवं संस्कृति की विभिन्न छवियों के दर्शन होते हैं। रात्रि में सर्वत्र रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते हैं। गणेशोत्सव के अंतिम दिन धूमधाम से प्रतिमाओं का विसर्जन नदी तटों, सरोवरों अथवा समुद्र में किया जाता है।

विदेशों में भी भक्ति भाव के साथ मनाया जाता है गणेशोत्सव

भगवान गणेश भारतीय संस्कृति के अभिन्न अंग हैं। अतः प्राचीन काल से ही निर्विघ्न कार्य संपन्न करने हेतु गणपति की पूजा सर्वप्रथम की जाती है। भक्ति-पूर्वक भगवान गणेश की पूजा जो भी करता है, उसके सम्मुख विघ्न कभी नहीं आते। यही कारण है कि विदेशों में भी गणेश चतुर्थी यानी गणेशोत्सव प्राचीन काल से ही मनाया जा रहा है। यह सत्य है कि एक समय ऐसा था, जब जापान, चीन, कंबोडिया, इंडोनेशिया, थाईलैंड, मलाया तथा मैक्सिको जैसे देशों में भी गणेश चतुर्थी का पावन पर्व बड़े ही धूमधाम के साथ मनाया जाता था। इन देशों में बहुतायत से गणेश जी की प्रतिमाओं का मिलना इसका प्रमाण भी है। उस कालखंड में गणेश पूजा को विश्व व्यापी मान्यता प्राप्त थी तथा गणेश भगवान को गणराज्य के अध्यक्ष के रूप में स्वीकार किया जाता था।

देवों में प्रथमपूज्य विघ्नहर्ता भगवान गणेश के प्रति भक्तों की आस्था विदेशों में आज भी कम नहीं है। ब्रिटेन में अप्रवासी भारतीय इस पर्व को पूरे रीति-रिवाज के साथ मनाते हैं। लंदन में सबसे पहले हिंदू संस्कृति एवं हेरिटेज सोसायटी नामक एक संस्था द्वारा विश्व हिंदू मंदिर में वर्ष दो हजार पांच में गणेशोत्सव मनाया गया। यहां गणेश पंडाल बनाए गए तथा उनमें गणपति की मूर्ति स्थापित कर संपूर्ण विधि-विधान के साथ उनकी पूजा-उपासना की गई।

क्यों प्रथम पूज्य हैं भगवान गणेश?

भगवान श्री गणेश प्रथम पूज्य क्यों? तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं में प्रथम पूजा के लिए उन्हें क्यों चुना गया? इतना बड़ा सम्मान उन्हें किस प्रकार मिला? आखिर क्यों गणेश जी की पूजा-अर्चना प्रत्येक धार्मिक आयोजनों में सर्वप्रथम होती है?

दरअसल, गणेश जी की उत्पति एवं इनके प्रथम पूज्य होने के संबंध में विभिन्न पुराणों में अलग-अलग कथाएं मिलती हैं। इनमें से कुछ ऐसी हैं जिनमें विशेष संदर्भो में समानता है। यदि बात रामायण काल की करें, तो गोस्वामी तुलसीदास जी श्रीरामचरितमानस की रचना के प्रथम मंगल श्लोक में ही श्री गणेश का स्मरण करते हुए कहते हैं, वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मंगलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ अर्थात: अक्षरों, अर्थ समूहों, रसों, छंदों तथा मंगलों की रचना करने वाली माँ सरस्वती तथा भगवान श्री गणेश जी की मैं वंदना करता हूं।

भगवान गणेश की पूजा सबसे पहले क्यों की जाती है, इस संबंध में बहुत रोचक कथा भी प्रचलित है। कथानुसार एक बार भगवान शिव के समक्ष श्री गणेश तथा कार्तिकेय दोनों भाइयों के बीच इस बात को लेकर विवाद हो गया कि दोनों में बड़ा कौन है। यह सुनकर भगवान शिव ने कहा कि जो अपने वाहन के साथ सबसे पहले समस्त ब्रह्मांड की परिक्रमा करके मेरे पास लौट आएगा, वही बड़ा माना जाएगा। यह सुनते ही भगवान कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर सवार होकर ब्रह्मांड की परिक्रमा के लिए निकल पड़े। परंतु भगवान गणेश ने अपने वाहन चूहे पर बैठ कर माता-पिता की परिक्रमा की तथा सबसे पहले उनके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए। उन्होंने कहा कि मेरी परिक्रमा पूरी हो गई। क्योंकि मेरा संसार मेरे माता-पिता में ही निहित है। बालक गणेश का यह बुद्धिमत्तापूर्ण उत्तर सुनकर भगवान शिव इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने श्रीगणेश जी को प्रथम पूज्य होने का वरदान प्रदान किया।

भगवान गणेश की चार भुजाओं का महत्व

ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार श्री गणेश के जन्म लेने पर माता पार्वती ने सभी देवी देवताओं को अपने यहां निमंत्रित किया, ताकि वे नवजात शिशु को आशीर्वाद दे सकें। सभी देवताओं ने गणेश जी को आशीर्वाद तथा अतुलनीय उपहार भी भेंट किए। इंद्रदेव ने अंकुश, वरुणदेव ने पाश, ब्रह्मा जी ने अमरत्व, माँ महालक्ष्मी ने ऋद्धि-सिद्धि तथा माता सरस्वती ने समस्त विद्याएं प्रदान कर गणेश जी को देवताओं में सर्वोपरि बना दिया।

सभी देवों में प्रथम पूज्य गणेश जी की चार भुजाएं चार प्रकार के भक्तों, चार प्रकार की सृष्टि तथा चार पुरुषार्थों के प्रतीक हैं। हाथों में धारण अस्त्रों में पाश जो है वह राग का तथा अंकुश क्रोध का संकेत है। वरदहस्त कामनाओं की पूर्ति तथा अभय हस्त सम्पूर्ण सुरक्षा का सूचक है। उनके सूप-कर्ण का अर्थ अज्ञान की अवांछित धूल को उड़ाकर उन्हें ज्ञान प्रदान करने का द्योतक है। नाग यज्ञोपवीत कुंडलिनी का संकेत है। शीश पर धारण चन्द्रमा अमृत का प्रतीक है।

गणेश जी का वाहन काला चूहा है। चूहा बहुत चंचल तथा बिना बात हानि करने वाला है। चूहा किसी बात की परवाह किए बिना किसी भी वस्तु को काट कर नष्ट कर सकता है। इसी प्रकार से कुतर्क बुद्धि भी मन के सात्विक भाव को खंडित करने का प्रयास करती है। यह मानव के राग-द्वेष आदि मानसिक गुणों से भरे मन का प्रतीक है। चूहे जैसे चंचल मन पर बुद्दि की भारी शिला रखनी आवश्यक है। वश में रह कर ही अमंगलकारी तत्व को मंगलमय वाहन अथवा साधन बनाया जा सकता है।

भगवान गणेश को मंगलमूर्ति क्यों कहा जाता है?

भगवान गणेश को मंगलमूर्ति कहा जाता है। क्योंकि इनके सभी अंग मनुष्यों को सीख देते हैं। गणेश जी का मस्तक काफी बड़ा है। अंग विज्ञान के अनुसार बड़े सिर वाले व्यक्ति नेतृत्व करने में योग्य होते हैं। इनकी बुद्घि कुशाग्र होती है। गणेश जी का बड़ा मस्तक सोच को हमेशा बड़ा बनाए रखने का ज्ञान भी प्रदान करता है।

गणपति की छोटी आंखें प्रत्येक चीज को सूक्ष्मता से परखकर ही कोई निर्णय लेने का ज्ञान प्रदान करती हैं।

गणेश जी के कान सूप जैसे बड़े हैं। अतः इन्हें गजकर्ण एवं सूपकर्ण भी कहा जाता है। गणेश जी लंबे एवं बड़े कानों से सबकी सुनते हैं। लेकिन अपनी बुद्धि एवं विवेक से निर्णय लेते हैं। गणेश जी की सूंड हमेशा हिलती-डुलती रहती है, जो उनके हर पल सक्रिय रहने का संकेत है। यह हमें ज्ञान देती है कि जीवन में सदैव सक्रिय रहना चाहिए।

शास्त्रों में गणेश जी की सूंड की दिशा का भी अलग-अलग महत्व बताया गया है। मान्यता है कि जो व्यक्ति सुख-समृद्वि चाहते हैं, उन्हें दायीं ओर सूंड वाले गणेश जी की पूजा करनी चाहिए। शत्रु को परास्त करने एवं ऐश्वर्य की प्राप्ति हेतु बायीं ओर मुड़ी सूंड वाले गणेश की पूजा लाभप्रद होती है।

गणेश जी को लंबोदर भी कहा जाता है। लंबोदर यानी लंबा हो उदर जिसका, अर्थात-श्री गणेश। लंबोदर होने का अर्थ यह है कि वे हर अच्छी और बुरी बातों को पचा जाते हैं तथा किसी बात का निर्णय सूझबूझ के साथ लेते हैं। बड़ा उदर खुशहाली का भी प्रतीक है। गणेश जी का बड़ा पेट हमें यह ज्ञान प्रदान करता है कि भोजन के साथ-साथ हम बातों को भी पचना सीखें।

गणेश जी का एक दांत टूटा हुआ है। अतः उन्हें एकदंत कहा जाता है। गणेश जी ने अपने टूटे हुए दांत को लेखनी बनाकर पूरा महाभारत ग्रंथ लिख डाला था। यह गणेश जी की बुद्घिमत्ता का परिचय है। गणेश जी अपने टूटे हुए दांत से यह सीख भी देते हैं कि चीजों का सदुपयोग किस प्रकार से किया जाना चाहिए।

By editor

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Verified by MonsterInsights