बसंती देवी अपने बेटे भगवत प्रसाद पाण्डेय और पोते शशांक पाण्डेय के साथ मतदान केंद्र पहुँचीं। यह सिर्फ एक परिवार का मतदान नहीं था, बल्कि तीन पीढ़ियों की सोच, जिम्मेदारी और नागरिक चेतना का जीवंत प्रदर्शन था।
कमजोर शरीर, उम्र का भार, लेकिन नज़रों में अटूट संकल्प बसंती देवी के हर कदम ने बताया कि वोट सिर्फ अधिकार नहीं, कर्तव्य भी है। उनका कहना है, वोट देना देश की सेवा है। उम्र भले बढ़ गई हो, ज़िम्मेदारी नहीं।
उनके बेटे भगवत ने कहा, माँ हमेशा कहती हैं ‘देश को बदलना है तो वोट डालो।’ हम सबने यह सबक बचपन से सीखा है।
वहीं, पोते शशांक की आंखों में गर्व था दादी को देखकर समझ आया कि लोकतंत्र में कोई छोटा-बड़ा नहीं होता, बस इरादा चाहिए। इस अनोखी तस्वीर ने गांव में नया जोश भर दिया। पहले जो बुज़ुर्ग और महिलाएँ मतदान को लेकर संशय में थीं, उन्होंने भी बसंती देवी से प्रेरणा लेकर मतदान किया।
यह सिर्फ एक कहानी नहीं यह चेतना की लौ है, जो हर नागरिक को यह याद दिलाती है कि लोकतंत्र की असली ताकत कागज़ की पर्चियों में नहीं, संकल्प की गहराइयों में बसती है।
बसंती देवी का यह कदम पूरे प्रदेश के लिए एक संदेश है जब लोकतंत्र की बात हो, तो उम्र नहीं, जिम्मेदारी मायने रखती है।
