लखनऊ में चाइल्ड ट्रैफिकिंग का एक राकृष्ट मामला सामने आया है, जहां एक महिला गिरोह बेबी डीलिंग के धंधे में लिप्त हैं। इस गिरोह की एक महिला सदस्य का नाम संतोषी है, जो अपने 45 साल के अनुभव के साथ इस अवैध व्यापार में काम कर रही है। एक बच्चे की डिलीवरी के लिए लखनऊ में यह महिला संभावित खरीदारों से बातचीत कर रही थी। यह स्थिति तब सामने आई जब दैनिक भास्कर की टीम ने इस गिरोह के बारे में जानकारी जुटाने का फैसला किया। रिपोर्टर ने पहले निर्दोष बनने का नाटक करते हुए संतोषी से संपर्क किया और कहा कि उन्हें संतान चाहिए, पैसे की कोई पाबंदी नहीं है।
संतोषी ने तुरंत अपनी सेवाएं देते हुए कहा कि वह उपयुक्त बच्चे की व्यवस्था कर सकती है, और उसने यह भी बताया कि लड़के और लड़की की कीमतें अलग-अलग होती हैं। लड़के का मूल्य 5 लाख और लड़की का 3 लाख बताया गया। इसके बाद संतोषी ने संभावित खरीदारों को बताते हुए कई विकल्प भी पेश किए, जैसे कि काले या सांवले बच्चों की कीमत कम होती है। इस बातचीत ने इस गिरोह के नेटवर्क और उनके काम करने के तरीके को उजागर किया, जो बेहद चौंकाने वाला था। दैनिक भास्कर की टीम ने इस गिरोह की गतिविधियों का खुलासा करने के लिए अपने अगले कदम उठाने का निर्णय लिया।
दैनिक भास्कर की टीम ने संतोषी से संपर्क साधते हुए उसे एक मीटिंग के लिए बुलाया। मीटिंग के दौरान, संतोषी ने यह भी साझा किया कि कैसे इस गिरोह ने पहले भी कई बच्चे बेचे हैं। उनका नेटवर्क उत्तर प्रदेश के अलावा झारखंड, हरियाणा और दिल्ली तक फैला हुआ है। संतोषी ने यह भी बताया कि यह व्यापार विश्वास पर चलता है, जिसमें माता-पिता के साथ मुलाकात नहीं कराई जाती। यह तब और चौंकाता है जब वह स्वीकार करती है कि कई माता-पिता आर्थिक तंगी के चलते अपने बच्चों को बेचने का निर्णय लेते हैं।
जब इस गिरोह की गतिविधियां और गहरी खोजबीन की गई, तो टीम को यह पता चला कि संतोषी खुद चार बच्चों की मां है। यह दृष्टिकोण और अधिक गंभीरता को दर्शाता है जब संतोषी यह बताती है कि इसके जैसे कई गिरोह इस तरह से बच्चों को एकत्र किया करते हैं। इनमें से कुछ बच्चे चुराए गए होते हैं, जबकि कुछ जरूरतमंद माता-पिताओं ने खुद अपने नन्हे-मुन्नों को बेचा था। लखनऊ के गुडंबा इलाके में अवैध गतिविधियों की जानकारी मिलने के बाद पुलिस की सहायता से इस गिरोह की जांच की गई और आगे की कार्रवाई की योजना बनाई गई।
यह घटना न केवल चाइल्ड ट्रैफिकिंग के खिलाफ लड़ाई में एक अहम कदम है, बल्कि यह समाज के प्रति हमारी ज़िम्मेदारी और जगरूकता के स्तर को भी दर्शाती है। ऐसे काले धंधों के खिलाफ हमें एकजुट होकर प्रयास करना होगा, ताकि मासूम बच्चियों और बच्चों के अधिकारों की रक्षा की जा सके। यह कहानी हमें यह याद दिलाती है कि हमें बच्चों के प्रति अपनी संवेदनशीलता और जिम्मेदारी को नहीं भूलना चाहिए।